“उपसंहार” Hindi Story For Kids Part 1

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

जैसे की आपको पता ही है की अगर कोई भी कहानी हम यहाँ हमारे वेबसाइट में पोस्ट करते है और वह बहोत लम्बी है तो हम उसे अलग अलग विभाग में पब्लिश करते है. ठीक वैसे ही यह कहानी थोड़ी लम्बी थी तो हमने इसे दो भाग में आपतक पहोचने की कोशिश किए हुई है. जहा से पहला भाग ख़तम होता है वही से आपको दूसरे भाग की शरुवात हुई मिलेगी.

“उपसंहार” हिंदी कहानी भाग 1

पृथ्वी का इतिहास भिन्न-भिन्न जातियों के उत्थान-पतन की स्थायी प्रतिध्वनि मात्र है। इस जातीय उत्थान-पतन में जो लोग इसकी उन्नति अथवा अधःपात में सहायता करते हैं वे लोकसमाज में अनन्त काल तक अपने किये कर्म के लिए पुरस्कार या तिरस्कार पाते हैं।

किन्तु जो लोग देह का रुधिर गिराकर-आकांक्षा और आग्रह के साथ जीवन का महामूल्य समय लगाकर जातीय जीवन का सङ्गठन और समुन्नति करते हैं वे, भिन्न रुचि, भि, भाव और भिन्न प्रवृत्ति के लोगों से परिपूर्ण पृथ्वी में सदा परम पूजनीय देवचरित्र के पुरुष कहलाते और आदर्श-मनुष्य कहलाये जाकर आदर पाते हैं । वे ही समाज की उन्नति के सहायक समझे जाकर पुजते हैं। ऐसे पूज- नीय मनुष्यों के आविर्भाव से पृथ्वी की सभी जातियाँ थोड़ा-बहुत गौरव पाती है। किन्तु वर्तमान समय की प्रबल और सौभाग्य के घमण्ड से फूल रही जातियों की दृष्टि में उपेक्षा के पात्र भारतसन्तान ही इस बारे में सबसे अधिक भाग्यवान हैं।

सच है कि वाशिंग्टन के नाम से अमेरिका-वासियों के हृदय में एक स्वर्गीय प्रकाश की रेखा प्रतिफलित होती है, कमनीयता की कोमल गोद में विकसित भावों के आधार एमर्सन के नाम से प्रकृति-चर्चा-प्रिय मनुष्यमात्र मुग्ध हो जाते हैं, थियोडोर पार्कर के विश्वविजयो पौरुष को स्मरण करके मनुष्यमात्र सिर झुकाते हैं, सामयिक त्रुटि और कमज़ोरी को भूलकर फांसवासी लोग नव्य यूरोप के जन्मदाता नेपोलियन के नाम पर उन्मत्त हो उठते हैं, वर्तमान प्रत्यक्षवादियों के पथ-प्रदर्शक महात्मा कॉन्ट और बेन्थम के शिप्य महामति मिल मनुष्य-समाज के चिर-सुहृद् समझे जाते हैं, धर्म-संस्कारक महात्मा लुथर कूड़ा- कर्कट से ईसाई-धर्म को निकालकर नवजीवन के मार्ग में अग्रसर करके पाश्चात्य समाज का बड़ा उपकार कर गये हैं।

यह सब सच है, किन्तु तब भी यह कहना पड़ता है कि इस बारे में भारत-सन्तानों के सौभाग्य की सीमा नहीं है। विदेशी महात्माओं की अपेक्षा हमारे यहाँ के महात्माओं की संख्या कहीं अधिक है । अत्यन्त प्राचीन काल में जिन्होंने जन्म लेकर हमारी प्यारी निवास-भूमि भारतवर्ष को गौरवशाली बनाया है उनका धारावाहिक रूप से संक्षिप्त उल्लेख करना भी यहाँ, स्थानाभाव से, असम्भव है; तथापि यह कहना बहुत ज़रूरी है कि जिस जाति के जातीयजीवन के मार्ग में पूर्ण घटनाओं की ओर नज़र डालते ही त्रेता के आदर्शपुरुष श्रीरामचन्द्र के चरित्र की महिमा आप ही आप अलक्षित भाव से हृदय में झलक जाती है और रामायण में वर्णित चरित्रों की कहानी चुपचाप, रात को ओस गिरने के समान, जातीय जीवन को सङ्गठित करती है, उस जाति के सौभाग्य की सीमा नहीं है।

द्वापर के धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में शर-शय्या पर पड़े हुए महानुभव भीष्मपितामह के वीर-व्रत की समाप्ति और उनके मुख से उस समय निकले हुए सदुपदेशों ने जिस जाति के चरित्र-गठन में सहायता की है-जिस जाति की राज- नीति, समाजनीति और धर्मनीति के विकास में श्रीकृष्ण ऐसे महा- पुरुष आदर्शरूप से विराजमान हैं—वह जाति सचमुच सौभाग्य- शालिनी है। किन्तु आज उसी जाति के नर-नारियों के सिखने-सिखाने और सुनने-सुनाने के अनेक अमूल्य चरित्र-रत्न उनकी झोपड़ियों के कूड़े-करकट में छिपे पड़े हैं। इसी से आज वह जाति कहीं उपेक्षित, कहीं परित्यक्त और कहीं अनाहत हो रही है।

अनेक अँगरेज़ी पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि राजा राममोहन राय और विद्यासागर ऐसे प्रतिभाशाली लोग इंगलैंड और अमेरिका में न पैदा होकर भारत में क्यों पैदा हुए? इसका सहज और स्वाभाविक समाधान यह है कि जो देश शाक्यसिंह की जन्मभूमि है, जहाँ शङ्कराचार्य ऐसे प्रतिभाशाली पराक्रमी महात्मा उत्पन्न हुए हैं, जहाँ चैतन्यदेव ऐसे धार्मिक भक्त पुरुप ने जन्म लिया उस देश के सिवा और किसी देश में राजा राममोहन राय और ईश्वरचन्द्र का जन्म नहीं हो सकता।

भारतवर्ष की विशेषता कहो और चाहे बंगाल का सौभाग्य कहो, जो राममोहन, ईश्वरचन्द्र, देवेन्द्रनाथ और केशवचन्द्र ऐसे महापुरुषों ने यहाँ जन्म लिया। कई शताब्दियों के साधु-सज्जनों और ऋपि- तपस्वियों की तपस्या के फल से हमारी जन्मभूमि इन सुपुत्रों को पाकर अपने अस्तित्व को सफल बना सकी है। प्राचीन मनस्वी आर्य भूपियों के चलाये काल-विभाग के अनु- सार सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग, इन चार युगों का उल्लेख पाया जाता है। बहुसम्मानास्पद श्रीयुत माननीय रमेशचन्द्र दत्त, सी० एस०, सी० आई० ई० महोदय ने इन चार युगों के साथ-साथ एक नवीन ऐतिहासिक समय-विभाग किया है। यथा १-वैदिक युग, २-महाकाव्य युग, ३–दार्शनिक युग, ४-चौद्ध युग, ५- पौराणिक ६-राममोहन राय युग। इनमें से हर एक युग की सुन्दर विवेचना की गई है। ‘राममोहन राय युग’ की व्याख्या में उनकी विवेचना का और भी अच्छा परिचय प्राप्त होता है।

राममोहन राय इस युग के जन्मदाता हैं। जो लोग विचारपूर्वक सब विषयों के सार-संग्रह में लगे हुए हैं वे देखेंगे कि जितने प्रकार के विचारों से युग, आज बंगाली-समाज भरा हुआ है उनका सूक्ष्म सूत्र राममोहन राय की प्रखर प्रतिभा से ही सम्बन्ध रखता है। शास्त्र-चर्चा और धर्म की आलोचना से लेकर जातीय शक्ति की रक्षा और अन्नहीन किसानों यथा मज़दूरों की अवस्था की उन्नति करना आदि हर एक विषय के साथ उक्त महात्मा का एक सा सम्बन्ध है। वे सभी बातों में युगान्तर उपस्थित कर देनेवाले पुरुष थे।

महात्मा राममोहन राय जिस युग के प्रवर्तक थे उसी युग के द्वितीय महापुरुष ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हैं। माननीय जज श्रीयुत सर गुरुदास बनर्जी ने, विद्यासागर के मरने के बाद, मेट्रोपोलीटन- कालेज की सभा में सभापति की हैसियत से कहा था-“He was second to none except one-Great Mohammedan Roy.” अर्थात, वर्तमान समय की सब अवस्थाओं की आलोचना करने से देख पड़ता है कि मृत महात्मा ( विद्यासागर), राममोहन राय को छोड़कर, तुलना में किसी से हीन न थे।

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य-माग में सारी पृथ्वी के लोगों की जातीय उन्नति और ऐश्वर्य के इतिहास में एक नवीन अध्याय की सूचना हुई। पौराणिक कथा में सुन पड़ता है कि भागीरथ ने बहुत तपस्या करके गङ्गा को लाकर पितरों की गति बनाई थी, वैसे ही मनुष्यों की सद्गति के लिए वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भ में जो महापुरुष तपस्या कर रहे थे उनकी साधना के बल से, मनुष्य- सन्तानों के सुख-सौभाग्य के अन्धकार-पूर्ण पूर्वाकाश में, सम्पत्ति-सूर्य के भावी अभ्युदय का आभास पाकर उस समय के ज्ञानी लोग पुलकित हुए थे।

जिस समय अमेरिका में महात्मा फ्रैंकलिन और पुरुषसिंह वाशिङ्गटन के पौरुष के बल से पराधीनता की दृढ़ वेड़ियाँ कट गई थीं और जातीय जीवन का स्रोत प्रवल वेग से प्रवाहित होना शुरू हुआ था, जिस समय पार्कर और गैरिसन अभागे निग्रो जाति के.गुलामों का दुःख दूर करने के इरादे से स्वार्थपर लोगों की मण्डली के विरुद्ध समर-घोपणा का सूत्रपात कर रहे थे, उसी समय अक्षता और कुसंस्कार के घने अँधेरे में डूबे हुए भारत में नवीन युग के आगमन का सङ्गीत सुन पड़ा था; जिस समय इंगलैंड में धर्क, फाक्स आदि राजनीति-विशारद लोग प्रबलों के किये विविध अत्याचारों को रोकने के लिए जान लड़ा रहे थे, जिस समय चिलबारफोर्स आदि सहदयों ने दुर्वलों के पक्ष का समर्थन करने में अपने को लगा दिया था, जिस समय महापुरुप नेपोलियन ने यूरोप के भाग्यचक को अपने इशारे पर चलाने के इरादे से दाहने हाथ की तर्जनी उठा- कर पृथ्वीमण्डल को चुप रग्बना चाहा था, जिस समय अनेकों सहदय महात्मा लोग पृथ्वी के अनेक स्थानों में असहाय मनुष्यों का दुःख दूर करकं उन्हें मुखी बनाने में लगे हुए थे, उसी समय प्रज्ञता और कुसंस्कार के पार, अन्धकार से आवृत भारत के भीतर आढम्बर के कोलाहल, तामसी रंगरस, धर्म के नाम से की जानेवाली अनेक प्रकार की अनीतियों की पूर्ण प्रतिष्ठा के बीच में नवीन युग के आने का सङ्गीत सुनाई पड़ा था।

विधाता की इच्छा से राजपि राम- मोहन राय अपने का समय के सम्पूर्ण उपयुक्त बनाकर भारत के पूर्वप्रान्त में प्रकट हुए थे। उन्होंने जान लड़ाकर जिन अच्छे कार्यों का सूत्रपात किया था वे उनकी अकाल मृत्यु से अधूरे पड़े हुए थे। कई एक वीर वङ्गालियां ने उन कार्यों को पूर्ण करने का भार अपने ऊपर लिया। जिम समय मंज़िनी और गेरीवाल्डी खदेश के उद्धार के लिए कमर कस चुकं थे, जिस समय सैफ्ट्सवरी, ब्राइट, कापडेन आदि महात्मा इंगलैंड में लाक-हित के व्रत में लगे हुए थे, जिस समय.

कुमारी कार्पेन्टर इँगलेण्ड के परित्यक्त युवक-युवतियों और बालक- चालिकाओं की दुर्दशा देखकर व्याकुल होकर लोकसेवा में लगी हुई थी और कठिन रुकावट के रहते भी सफलता प्राप्त करके Reformatory School Act पास करा रही थीं उसी समय तरह- तरह के सामाजिक उत्पीड़न सहते हुए दयासागर ईश्वरचन्द्र भारतीय नारियों को सुखी करने का मार्ग साफ़ कर रहे थे; जिस समय कुमारी काव् और कुमारी नाइंटेंगिल स्त्रियों के हित के लिए जन्म भर कुमारी रहने को तैयार हो रही थी, जिस समय रूस के सम्राट अलेक्ज़ण्डर ने सिंहासनारोहण की खुशी में दो करोड़ तीस लाख मनुष्यों को गुलामी से छुटकारा दे दिया था, जिस समय मनुष्य- देवता लिङ्कन ने अपने जीवन के बदले दासों की स्वाधीनता की सनद पर हस्ताक्षर किये थे, उसी समय सैकड़ों प्रकार के सामाजिक उत्पी- डन सहते हुए वङ्गवीर ईश्वरचन्द्र भारत की नारियों को सुखी बनाने का मार्ग साफ़ करने में लगे हुए थे। अव इम उनके उसी गुण, वीरता, साहस और पौरुप की संक्षिप्त समालोचना करेंगे

Summary

मुझे विश्वाश है की इस कहानी में आपको मजा आया होगा, ऐसी ही मजेदार कहानियो और कविताओं के लिए आप हमारे वेबसाइट को रेगुलरली विजिट कर सकते है. और हम आपसे वादा करतव है की आपको रोज अपडेट देते रहगे।

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