“उपसंहार” Hindi Story For Kids Part 2

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“उपसंहार” हिंदी कहानी भाग 2

जिसके कारण वे वर्तमान युग के सर्वश्रेष्ट व्यक्ति माने जाते हैं। वे बड़े आदमियों की तरह अनेक सुख भोगकर नहीं पले. जङ्गली फूल जैसे बिना किसी यत्न के आप ही उत्पन्न होता है और खिलता है वैसे ही विद्यासागर वीरसिंह गाँव के घर में गरीब घराने में जन्म लेकर आप ही अपनी चेष्टा से विकसित हुए।

गरीव पिता ठाकुरदास ने किस तरह क्लेश उठाकर उनको पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया, यह पहले ही लिखा जा चुका हाल को सुनकर कोई भी सहृदय पुरुष उनको धन्य कहे बिना नहीं रह सकता। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि अपरिचित गरीव वालक जवानी की अवस्था में सुख-सम्भोग और प्रतिष्ठा पाकर संसार को तुच्छ समझते हैं, किन्तु विद्यासागर ने अतुल सम्मान और सम्पत्ति पाकर भी कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने बहुत विद्याएँ पढ़ीं, बहुत-सा ज्ञान, धन, सम्पत्ति और सम्मान प्राप्त किया, तब भी वे एक दिन या एक घड़ी के लिए अपने को नहीं भूले।

वे सदा यह समझते रहे कि मैं वीरसिंहनिवासी गरीव ठाकुरदास वन्द्योपाध्याय का लड़का हूँ। झोपड़ी में वचपन बिताया था, इस बात को वे सदा गौरव के साथ स्मरण करते थे। एक वक्त खाकर और कभी. कुछ न खाकर उन्होंने अपना छात्र-जीवन विताया था, इसका उल्लेख करने में वे कभी सङ्कचित न होते थे। तथापि उस समय उनसे बढ़कर प्रतिष्टित पुरुप बङ्गाल में बहुत कम थे।

आज जो बँगला भाषा पढ़ी जाती है, उसके सङ्गठन के लिए बङ्गाली-मात्र पनके विशेष ऋणी और कृतज्ञ हैं। उन्होंने और अक्षयकुमार दत्त ने वर्तमान बंगला की सृष्टि की है। दोनों ने बंगला-साहित्य की बड़ी सेवा की है। ये लोग अगर बॅगला-साहित्य के सेवक न होते तो उसकी इतनी जल्दी ऐसी उन्नति कभी न होती। साहित्य-सेवा में भी विद्यासागर की मौलिकता और काम करने की अद्भुत शक्ति स्पष्ट देख पड़ती है।

एक दिन केवल कई घण्टे परिश्रम करके उन्होंने उपक्रमणिका बना डाली। उपक्रमणिका में उनकी विशेषता का विशेप परिचय प्राप्त होता है। बेताल-पचीसी, शकुन्तला और सीता-वनवास आदि पुस्तकों ने जिस लेखनी का गौरव बढ़ाया उस लेखनी की विशेपता यह है कि बच्चों के पढ़ने के. लायक ग्रन्थ भी उसी से लिखे गये। उसी लेखनी से ‘वर्णमाला’ और ‘वर्णपरिचय’ भी लिखा गया। ये पुस्तकें भी स्कूल का मोमा– यना करने के लिए जाते समय, रास्ते में पालकी पर, उन्होंने लिखी थीं।

कोमलता और कठिनता का समावेश विद्यासागर के साहित्य- सम्बन्धी कार्य में भी देखा जाता है लड़कपन से ही दूसरों की सेवा करते रहकर जवानी के प्रारम्भ में जब वे सम्मान-प्रतिष्ठा के उच्च शिखर पर पहुँचे तभी से उन्होंने गुणी के गुण का आदर करने में, दुखियों का दुःख दूर करके उन्हें सुखी बनाने में अपने जीवन को अर्पण कर दिया। उन्होंने उस समय के अपने सर्व-श्रेष्ठ अधिकार को मनुष्य-सेवा में लगा दिया। गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिङ्ग के साथ परिचय होने के साथ ही उन्होंने हार्डिङ्ग-विद्यालय खुलवा दिये। इस तरह प्रेम-पूर्ण सेवा का भाव लेकर उन्होंने अपने जीवन के महाव्रत को पूर्ण करने का सूत्रपात किया।

जिस भुवनविजयी कार्य के आगे सव भारतवासियों ने सिर मुकाया, जिस समाज-संस्कार के काम में उन्होंने सत्साहस, सत्य- निष्ठा और मनुष्यत्व का पूर्ण परिचय देकर अमर कीर्ति प्राप्त की उसका भी छोटा-सा अङ्कुर छात्रजीवन में ही उनके हृदय में उग आया था। बालक ईश्वरचन्द्र बालिका आत्मीया विधवाओं की दुर्दशा देखकर त्रियों के पक्षपाती वन गये थे। बैसाख-जेठ की कड़ी धूप में जिस समय पृथ्वी और आकाश जलता है उस समय पानी के लिए, एका- दशी के दिन, बालिका विधवाओं को* छटपटाते देखकर विद्यासागर ने प्रतिज्ञा की थी कि “यदि कभी सुयोग प्राप्त होगा तो इन सुकोमल रमणियों की यह दुःख-दुर्दशा मिटाने का उद्योग अवश्य करूँगा।”

“अपने गुरु वृद्ध वाचस्पतिजी की वालिका स्त्री को देखकर बड़े दु:ख के साथ वे रोने लगे थे। वे एकमात्र बालिका के भावी परि- साल में विधवाएँ एकादशी का निर्जल व्रत करती हैं। लिए बहुत ज़रूरी समझा जाता है और चाहे प्राण निकल जायें, पर नन्हें पानी नहीं दिया जाता। यह उनके शाम को ही विचारकर ऐसे व्याकुल नहीं हुए थे। तरह की अनेक वालिकाओं पर ऐसा सामाजिक अत्याचार होने देखकर उनसे नहीं रहा गया।

वे स्त्रियों का पक्ष लेकर प्रकले ही सारे समाज को परास्त करने के लिए उठ खड़े हुए। सहृदय वीर पुरुष के लिए यही स्वाभाविक था। गरीब के घर अनेक प्रकार के प्रभावों में जन्म लेकर समाज के शिरोभाग पर स्थान प्राप्त करने में समर्थ होना और हमेशा दीन- दुखियों के हित और सहायता के लिए आप कष्ट सहना सबका काम नहीं है। ऐसे काम इस तरह के महान पुरुप ही कर सकते हैं।

वे स्कूल में आदर्श विद्यार्थी, कामकाज के मैदान में निष्टाबान् और कर्तव्यपरायण आदर्श कर्मचारी और साहित्य-सेवा के मार्ग में सरल, परेमार्जित और श्रुतिमधुर गद्यरचना के पथप्रदर्शक रूप से हनारे सामने मौजूद हैं। मित्रों की सेवा करने में उनकी कोई बरावर्ग नहीं कर सकता ।

राजा प्रतापसिंह सदा उनके सहायक मित्र रहे। विधवा-विवाह के आन्दोलन में उन्होंने धन से और कार्य से भी विद्यासागर की सहायता की थी। उस मित्रता के ऋण को विद्या- सागर सदा कृतज्ञता के साथ स्मरण करते थे। राजा साहब के मरने पर उन्होंने उनके नावालिग पुत्रों की भलाई करने में कोई कसर उठा नहीं रक्खी। समाज-संस्कार के मैदान में आज उनकी जगह पर काम करनेवाला कोई नहीं देख पड़ता ।

उन्होंने बार वेश से बड़े होकर जातीयजीवन का कूड़ा-करकट निकालकर फेक देने के लिए कमर कसी थी। उनके इस कार्य का उचित आदर हम लोग नहीं करते। हम लोग समय और अवस्था की वेड़ियों में जकड़े हुए हैं। हम उनकी मुक्त शक्ति, मुक्तभाव और उदारतापूर्ण स्वाभिमान का सचा सम्मान किस तरह कर सकते हैं ? अपनी उपमा वे आप ही हैं। उन्होंने समाज-संस्कार-सम्बन्धी आन्दोलन के अवसर पर सर्व- साधारण के निकट अपना यथार्थ परिचय दिया था।

उनकी अपरि- पेय शारीरिक और मानसिक शक्ति, विद्या-बुद्धि और जटिल सामा- जिक प्रश्नों के बारे में जानकारी और उनका किसी काम में भिड़ना सचमुच ही विचित्र और विलक्षण था। आगे की पीढ़ियों के बङ्गाली सदा उनको अपना गौरव समझेंगे और जितना समय वीतता जायगा उतना ही उनका चरित उज्ज्वल माधुर्य के साथ लोगों के मन को मुग्ध वनावेगा। उन्होंने मनुष्यप्रेम का पूर्ण अनुभव प्राप्त किया था। वे मनुष्य- मात्र को सच्चे स्नेह की दृष्टि से देखते थे। वैसे स्नेह की दृष्टि से लोग अपने सगों को भी नहीं देख सकते।

विद्यासागर लड़कपन से ही परोपकारी और दयालु थे। वारह वर्ष के बालक विद्यासागर आप अनेक कष्ट सहकर भी छात्रवृत्ति के रुपये से गरीव सहपाठियों की सेवा और सहायता करने लगे थे। इतनी घोड़ी अवस्था में जो वालक पराये दुःख को देखकर व्याकुल हो उठता था, दूसरों को सुखी बनाने के लिए आप सव तरह के कष्ट सह सकता था, वह दृढ़प्रतिज्ञ वालक अगर आगे चलकर परसेवापरायण महापुरुष के रूप में संसार के आगे उपस्थित हो तो उसमें आश्चर्य ही क्या है ? परोपकार करते समय विद्यासागर महाशय अपने-गैर, स्वजा- तीय-विजातीय, स्वदेशी-विदेशी, बी-पुरुप आदि का विचार नहीं करते थे।

मनुष्यमात्र पर उनका एक-सा अनुराग था। पता लगाने से मुझे मालूम हुआ है कि संकट में पड़े हुए परिवार सहित मदरासी ने उनकी सहायता पाकर अपने प्राण बचाये हैं, गरीव फिरङ्गी ने उनकी सहायता से अपने परिवार को मृत्यु के मुख में जाने से बचाया है और सब आदमियों द्वारा त्यागी गई मर रही कुलटा ने भी उनकी सेवा से जीवन पाया है ! जिस महापुरुष ने यह देखकर कि दूध दुह लेने से गाय के बछड़े को कष्ट होता है और वह भूखा रहता है, वहुत दिनों तक दूध पीना छोड़ दिया था उस महात्मा के दय की कोमलता का अनुभव भी शायद हम लोग नहीं कर सकते।

इसी से कहना पड़ता है कि लोकहितैपिता और जीव-दया में वे अद्वितीय थे। बह रहा गङ्गा का जल जैसे समयानुसार पर्वत को नाँधकर दाहने और वायें सुख-सम्पत्ति, पुण्य और पवित्रता फैलाता हुआ सागर की ओर जाकर उसमें लीन हो जाता है वैसे ही विद्यासागर की दया का स्रोत कठिन कष्टों को नाँचता हुआ आसपास के और सारे देश के लोगों को सुखी बनाता हुआ उनके प्राणों के साथ अन्त को अनन्त दयामय के श्रीचरणों में जाकर लीन हो गया।

हमको भी विद्यासागर के जीवनचरित्र से दया, परोपकार, दृढ़ प्रतिज्ञा, खाभिमान, स्वावलम्ब आदि सद्गुणों की शिक्षा प्राप्त करके अपने चरित्र को ऐसा बनाना चाहिए कि उससे अपना, समाज का, देश का और संसार का उपकार और कल्याण हो ।

अगर हम इसके लिए चेष्टा करेंगे, सैकड़ों वाधा-विनों की परवा न करके कर्त्तव्यपालन पर दृढ़ रहेंगे तो अवश्य परमेश्वर हमारा सहायक होगा; जैसा कि एक फ़ारसी का कवि कह गया है-“हिम्मते मदी मददे खुदा।” तथास्तु । वीरकेसरी नेपोलियन बोनापार्ट- इस पुस्तक में ग्राम के प्रसिद्ध वार सम्राट् नेपोन्नियन के जीवन फी प्रायः समन्त छोटी-बड़ी घटनाओं का समावेश हो गया है।

नेपोलियन की शिक्षा, उसका नरकारी नौकरी में प्रवेश, चढ़ते-बढ़त मम्राट् नक दी जाना, यूरोप कं भिन्न-भिन्न नरेशों के साथ सन्धि- विग्रह, जीत का सदुपयोग, प्रजा-पालन-चातुरी, रण-दक्षता, उसका प्रथम और द्वितीय विवाह, अन्तिम युद्ध और निर्वासन तथा उसके पश्चात् फ्रांस की दशा आदि का वर्णन इस ग्रन्ध में है। हिन्दी में गन्नियन का ऐसा विस्तृत जीवनचरित अब तक नहीं था। पृष्ठ- न्या ६५% से ऊपर आठ पाने । सुन्दर पर तीन रुपये। महादेव गोविन्द रानडे- न्यायमूर्ति रानडं प्रसिद्ध देशभक्त और समाज-सुधारक हो गये हैं।

सरकारी नौकर होने पर भी वे सदा किसी न किसी रूप में देश-सेवा किया करते थे। राजा और प्रजा सभी के यर्दा उनका मान था। देश और समाज की उन्नति के लिए कटिबद्ध, अनेक रजन उनको गुग का पासन देते हैं। उनका जीवन-चरित अनेक पुस्तकों के आधार पर श्रीयुत सूर्यराम सोमेश्वर देवाश्रयी ने गुजराती में लिखा है। उक्त पुस्तक का यह हिन्दा-अनुवाद है। प्रात:- मरणीय रानडे महादय का इससे बढ़कर जीवन-चरित शायद ही नहीं मिले। यह पुस्तक प्रत्येक हिन्दी-भाषा-भापी के काम की है। उसंख्या पाने चार सौ से ऊपर ।

अमरीका के एक प्रेसीडेंट का नाम “जेम्स एवरम् गारफ़ाल्ड’ था। उसका चरित्र इस पुस्तक में लिखा गया है। गारफील्ड का जन्म एक साधारण किसान के घर में हुआ था। उसने अपने उत्साह, साहस और दृढ़ सङ्कल्प के कारण अमरीका के प्रेसीडेन्ट का सर्वोच्च पद प्राप्त कर लिया था। हमारे देश के नवयुवकों के लिए इस पुस्तक में बहुत कुछ उपदेश की सामग्री है। मूल्य ॥ बारह आने।

हिन्दी-कोविद-रत्नमाला दो भाग पहले भाग में भारतेन्दु वावू हरिश्चन्द्र और महर्षि दयानन्द सरस्वती से लेकर वर्तमान समय तक के हिन्दी के नामी चालीर लेखकों और सहायकों के सचित्र और संक्षिप्त जीवन-चरित दि) गये हैं और दूसरे भाग में पं० महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा माधवराव सप्रे, वी० ए० आदि विद्वानों के तथा विदुषी खियों जीवन-चरित छापे गये हैं। हिन्दी में यह पुस्तक अपूर्व है। प्रत्येक हिन्दी-भाषा-भाषी को यह ‘रत्नों की माला’ मँगाकर अपने कण्ठ की शोभा बढ़ानी चाहिए। प्रत्येक भाग में ४० हाफ़टोन चित्र दिये गये हैं।

Summary

मुझे विश्वाश है की इस कहानी में आपको मजा आया होगा, ऐसी ही मजेदार कहानियो और कविताओं के लिए आप हमारे वेबसाइट को रेगुलरली विजिट कर सकते है. और हम आपसे वादा करतव है की आपको रोज अपडेट देते रहगे।

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