“धर्म मत” हिंदी नैतिक कहानी – Hindi Moral Story

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“धर्म मत” बच्चो के लिए हिंदी नैतिक कहानी

बहुत लोगों की धारणा यह है कि विद्यासागर को किसी धर्म या मत पर विश्वास न था। किन्तु मैंने उनके साथ इस मामले में बातचीत करके जहाँ तक समझा है, और उनके आचार-याचरण से जहाँ तक जाना जाता है, उससे यह ज्ञात होता है कि वे ईश्वर पर विश्वास रखनेवाले आदमी थे।

किन्तु उनका धर्म-विश्वास साधारण लोगों की किसी एक पद्धति के अधीन न था। अत्यन्त सूक्ष्म रूप से जाँच करके देखने से जान पड़ता है कि उनके नित्य के जीवन के आचार-व्यवहार क्रिया-कलाप-सम्पन्न आस्थावान् हिन्दू के अनुरूप न थे और दूसरी ओर निष्ठावान् ब्राह्मसमाजी पुरुप के लक्षण भी कभी उनमें देखे नहीं गये। एक अनादि अनन्त पुरुप सृष्टिकर्ता-रूप से विश्व-ब्रह्माण्ड में सर्वत्र पूर्ण रूप से व्यान और प्रकाशित हैं।

सव जीव, उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में अवस्थित हैं। समय पूर्ण होने पर उन्हीं में लय हो जायेंगे महाभारतकार महर्षि व्यास के ववलाय इस सूक्ष्मतम धर्मसूत्र पर वे विश्वास करते थे। उनको इस धर्म-सूत्र पर विश्वास था, इसी से पृज्यपाद देवेन्द्रनाथ ठाकुर के नवीन उद्यम से उद्भासित धर्म के आन्दोलन से जब ब्राहा-समाज सङ्गठित और पुष्ट हो रहा था, उस समय उन्होंने ब्राह्म-समाज की सेवा में अपने जीवन के प्रथम उद्यम और आग्रह को लगाया था। उन्होंने खुद मुझसे कहा था-“अनेक प्रकार के मतभेद के कारण जव अप्रिय मनोमालिन्य की नौवत आने लगी तब उस गोल- माल में पड़कर अशान्ति बढ़ाने के लिए मेरी प्रवृत्ति नहीं हुई।

व्यक्तिगत मतभेद की अत्यन्त अधिक प्रवलता देखकर मैं धीरे-धीरे अलग हो गया। यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि इस संसार का एक प्रभु है। किन्तु मैं यह नहीं समझता और न किसी को समझाने की चेष्टा करता हूँ कि इस मार्ग में न चलकर इस मार्ग में चलने से अवश्य वह संसार का स्वामी हम पर प्रसन्न होगा- स्वर्ग-राज्य के हम अधिकारी होंगे। लोगों को यह समझाकर मैं खुद फँसना नहीं चाहता।

एक तो स्वयं सैकड़ों अन्याय के काम करके मैंने अपने पाप का वोझ भारी कर लिया है, उस पर दूसरों को मार्ग दिखलाने जाकर उन्हें कुमार्ग पर चलाऊँगा तो अन्त को दूसरों के लिए वेत खाने की नौवत आयेगी। अपने लिए चाहे जो हो, परन्तु दूसरों के लिए, भैया, मुझसे वेत न खाये जायेंगे ।

यह काम मुझसे न होगा। मेरी समझ में जो आता है उसी मार्ग पर मैं चलने की चेष्टा करता हूँ। लोग अगर ज़्यादः ज़ोर डालते हैं तो मैं कह देता हूँ कि इससे अधिक मेरी समझ में नहीं आता।” पहले ही इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि ब्राह्मसमाज के अनेक आदमियों को वे हार्दिक श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। पण्डित विजयकृष्ण गोस्वामी को वे बहुत प्यार करते थे।

उन्होंने एक बार विद्यासागर से भेंट करके ‘वोधोदय के सम्बन्ध में कहा- “महाशय, बहुत लोग मुझसे कहते हैं कि विद्यासागर ने लड़कों के लिए ऐसी सुन्दर एक पुस्तक लिखी, उसमें वालकों के जानने की सव वाते हैं, केवल ईश्वर के विपय में कोई बात क्यों नहीं है ?” विद्यासागर ने ज़रा हँसकर कहा-“जो लोग तुमसे यों कहते हैं उनसे कहना कि अबकी बार जो वोधोदय का संस्करण निकलेगा उसमें ईश्वर की वात रहेगी।” इसके बाद के संस्करण में, वोधोदय में, ईश्वर-सम्बन्धी एक पाठ बढ़ा दिया गया।

अगर उनके धर्मविश्वास के विरुद्ध यह बात होती तो वे बालकों की पाठ्यपुस्तक में ईश्वर- सम्बन्धी पाठ कभी न बढ़ाते ! बोधोदय का मत ही उनका धर्म-मत है। उक्त गोस्वामीजी का कहना है कि विद्यासागरजी बड़े भारी धर्म-विश्वासी आदमी थे। किन्तु वे किसी को अपना धर्ममत या धर्मविश्वास दिखलाना या जानने देना नहीं चाहते थे। वे अपने धर्म- मत और धर्मविश्वास को सदा गुप्त रखना चाहते थे।

गोस्वामीजी के उपदेशक बन जाने के बाद एक दिन विद्यासागर ने उनसे कहा- “तुम कुछ ‘एक’ हो गये हो न ?” उपदेशक बनने को ही वे एक विभीपिका समझते थे। वे समझते थे कि उपदेशक बनने से मनुष्य की स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है। इसी से उन्होंने गोस्वामीजी से यह कहा था। एक वार साधारण ब्राह्मसमाज के उपदेशक श्रीयुत शशिभूपण वसु महाशय सिटी कालेज के वर्तमान अध्यक्ष श्रीयुत हेरम्बचन्द्र मैत्र एम ए के पिता चन्द्रमोहन मैत्र महाशय को विद्यासागर के पास ले गये।

वादुड़ बागान में विद्यासागर के घर के आसपास आध घण्टे तक घूम-फिरकर भी वे घर का पता न लगा सके। अन्त को वृद्ध मैत्र महाशय ने किसी-किसी से पूछकर विद्यासागर के घर का पता लगा लिया। विद्यासागर से मुलाकात होने पर मैत्र महाशय ने सब हाल कहा। विद्यासागर ने मैत्र बाबू के साथी का परिचय पाकर जब जाना कि वे वादुड़ वागान में ही रहते हैं और ब्राह्मसमाज के उपदेशक हैं तव विस्मित होकर कहा-“पास ही के उस घर में रहकर भी वृद्ध मैत्र बाबू को यहाँ तक लाने में इतनी तकलीफ़ तुमने दी।

लोगों को तुम परलोक का मार्ग कैसे दिख- लाते होगे ? यही मार्ग दिखलाने में जव तुम इतनी गड़बड़ करते हो तब उस न-जानी राह में लोगों को किधर किस तरह भेज देते हो? मैं समझ गया। तुम इस रोज़गार को शीघ्र छोड़ दो। यह तुम्हारा काम नहीं है। जो जाने हुए रास्ते में इतनी गड़बड़ करता है वह वे-जाने रास्ते में लोगों की न-जाने कितनी दुर्दशा करेगा। मैया, तुम यह काम न करो।” इन व्यङ्ग्य की बातों से उनकी धर्मसम्बन्धी धारणा अच्छी तरह समझ में आ जाती है। वे धर्मविश्वास में किसी की अपेक्षा हीन न थे।

इसका परिचय इसी से प्राप्त होता है कि निर्जन-प्रिय योगी ऐसे कालीकृष्ण मित्र महाशय उनके बड़े गहरे मित्र थे। विद्यासागर ने ज्वालायन्त्रणामय संसार की रुखाई से बचने के लिए बारासात में मित्र महाशय के साथ वहुत सा समय विताया। मित्र महाशय के निर्जन कुटीर में, निष्ठापूर्ण तपस्या के स्थान में, विद्यासागर प्रायः बड़े सुख से रहते थे। किन्तु समय-समय पर मैंने उन्हें विधाता की बुद्धि पर खेद प्रकट करते और दुःखित होते देखा है।

अनेक देशों के असंख्य नर-नारियों के साथ “सर जान लारेन्स, नामक स्टीमर जब जलमग्न हो गया था तब मेरे सामने, आँखों में आँसू भरकर, बड़े दु:ख के साथ उन्होंने कहा था-“दुनिया का मालिक क्या हम लोगों से भी बढ़कर निठुर है ? अनेक देशों के अनेक स्थानों के असंख्य लोगों को उसने एक साथ हुवा दिया! मुझसे जो सुना नहीं जाता उसे उन्होंने कैसे कर डाला ? वे परम कारुणिक मङ्गलालय कहलाते हैं।

उन्होंने इन ७-८ सौ लोगों को एक साथ डुबाकर घर-घर कैसे शोक की आग जला दी ? दुनिया के मालिक का क्या यही काम है! यह सब देखने से सहसा यह नहीं जान पड़ता कि कोई दुनिया का मालिक है।” समय-समय पर उनके मुँह से ऐसी बाते सुनकर कोई-कोई उन्हें निरीश्वरवादी समझने लगे थे। किन्तु ऐसा समझने का कोई कारण नहीं है। क्योंकि ऐसी दारुण मर्म-पीड़ा के समय, ईश्वर के अनेक भक्त सन्तान भी, हृदय की गहरी वेदना प्रकट करने में इसी तरह के भाव का परिचय दे बैठते हैं।

विद्यासागर का जीवनचरित लिखते समय जो पत्र आदि मुझे मिले हैं उन सबमें ऊपर “श्रीश्रीहरिः शरणम्” लिखा हुआ वे केवल लोंकाचार के वशवर्ती होकर कोई भी काम नहीं करते थे। जो बात उनके हृदय-द्वारा अनुमोदित होती थी उसी को करते थे। अनेक लोगां ने अनेक समय उनका धर्म-मत जानने के लिए चेष्टा की है। किन्तु वे धर्म के बारे में सहज ही अपनी सम्मति स्पष्ट- रूप से किसी पर प्रकट न करते ।

दिवगी में प्रायः ऐसे प्रश्नों को टाल देते थे। कोई स्नेह-पात्र पुरुप अगर बहुत कुछ अनुरोध करता घा तब उसके अनुरोध को टाल न सकन के कारण अपना असल धर्म-मत प्रकट करते थे। एक बार उनके स्नेहपात्र डाकृर श्रीयुत अमूल्यचरण वसु ने उनका धर्म-मत जानने के लिए बहुत प्रार्थना की तव उन्होंने अन्त को कहा था, “गीता के उपदेश के अनु- सार चलना ही अच्छा है।” परमहंस रामकृष्ण धर्मात्मा साधुओं के दर्शन पाने से बहुत सुखी हात थे। सौभाग्यवश मैंने उनको अक्सर ऐसे धर्मात्मा साधुओं से मिलते देखा है।

एक समय उन्होंने अपने शिष्यों से कहा–“एक बार विद्यासागर महाशय से मुलाकात करूँगा।” शिष्यों के कारण पृछने पर उन्होंने कहा-“विधाता की कृपा और भगवान में भक्ति थी। के बिना वैसे महापुरुप का अभ्युदय नहीं होता।” इसके बाद एक दिन विद्यासागर को देखने आने का प्रबन्ध हुआ । परमहंस देव के आते ही उनको बड़े आदरसे लेने के लिए विद्यासागर जैसे आगे बढ़े वैसेही विद्यासागर के पास ज़मीन पर बैठकर परमहंस देव ने कहा-“नाला-खोरा, गया, नदी आदि पार होकर अब सागर के पास पहुँच गया ।”

इसके उत्तर में विद्यासागर ने कहा-“अव तो आप पा ही गये, अब कोई उपाय नहीं। दो-एक घड़े खारा पानी ले लीजिए। खारे पानी के सिवा और कुछ भी यहाँ आपको नहीं मिलेगा।” परमहंस देव ने कहा-“सागर वो केवल खारा ही नहीं है। दूध का समुद्र है, दही का समुद्र है, शहद का समुद्र है, इस तरह अनेक समुद्र हैं। आप तो अविद्या के सागर नहीं हैं, विद्या के सागर हैं। आपमें रत्न ही मिलते हैं आ गया हूँ तो रत्न ही लूँगा। खारा पानी क्यों लेने लगा ?” इस तरह आनन्द की वातचीत होने के बाद दोनों सज्जनों में खूब वार्तालाप हुआ।

उस वार्तालाप को सुनकर पास बैठे हुए सब लोग वहुत प्रसन्न हुए। उनके धर्म-विश्वास का एक स्वाभाविक परिचय देकर यह अध्याय समाप्त किया जायगा। विद्यासागर एक दिन कई बन्धुओं के साथ बैठे वातचीत कर रहे थे। इसी समय एक मुसलमान अन्धा और लँगड़ा फ़कीर एक गीत गाता हुआ उधर से निकला । गीत का पहला चरण “कहाँ भूल रहे हो निरजन’ सुनते ही विद्यासागर ने उसे बुलवाया। उसके आने पर उसे विठलाकर इस गीत को कई बार जी भरकर सुना। जब तक वे गीत सुनते रहे तब तक उनकी आँखों से लगातार आँसुओं की धारा बहती रही । हो जाने पर भी वे बहुत देर तक चुपचाप सङ्गीत के भाव में मग्न बैठे रहे। उसके बाद उसे आठ आने पैसे देकर बिदा किया और गीत समाप्त.

Summary

मुझे विश्वाश है की इस कहानी में आपको मजा आया होगा, ऐसी ही मजेदार कहानियो और कविताओं के लिए आप हमारे वेबसाइट को रेगुलरली विजिट कर सकते है. और हम आपसे वादा करतव है की आपको रोज अपडेट देते रहगे।

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