“विषय” हिंदी नैतिक कहानी – Hindi Moral Story Part 1

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“विषय” बच्चो के लिए हिंदी नैतिक कहानी भाग 1

सन् १८६६ में, या इसके कुछ पहले, वङ्गाल के ज़मांदारों और राजाओं के नाबालिग लड़कों की देखरेख के लिए वार्ड-इन्स्टी- शन नाम का एक निवासभवन स्थापित हुआ था। बंगाल के राजकुमार और ज़मींदारों के लड़के यहीं रहकर लिखना-पढ़ना सीखते थे। विद्यासागरजी इसके सञ्चालकों और निरीक्षकों में एक प्रधान पुरुप थे। बहुत दिनों से वे इसकी कार्यवाही के निरी- क्षक का काम करते थे।

एक बार वार्ड के लड़कों के खाने-पीने आदि कई विषयों पर डाकृर राजेन्द्रलाल मित्र के साथ विद्यासागर का मतभेद हो गया। अन्त को वैमनस्य की नौबत आ गई । विद्यासागर और मित्र महाशय, दोनों ही स्वाधीन प्रकृति के पुरुष थे । इस कारण दोनों की स्वाधीनता के सङ्घर्पण से अग्नि प्रकट हो गई। ऐसी अप्रिय घटना उपस्थित होने पर विद्यासागरजी अक्सर अशान्ति को शान्त करने के लिए, दूसरों को हटाने की चेष्टा न करके पापही हट जाते थे।

यहाँ भी उन्होंने वही किया। इन्स्टीट्य शन काम से अलंग होने की इच्छा करके उन्होंने इस्तीफ़ा दाखिल कर दिया। इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए सञ्चालकों ने उनसे बारम्बार अनुरोध किया, लेकिन इसके लिए विद्यासागर राज़ी नहीं हुए । उनको अपनी प्रतिज्ञा पर इस तरह अटल देखकर अन्त को इस्तीफ़ा मजूर कर लिया. सन् १८६६ ई० के शेष भाग में पाइकपाड़ा के राजा प्रतापचन्द्र सिंह बहादुर बीमार होकर, रोग से छुटकारा पाने और खास्थ्य बढ़ाने के लिए, काँदी के राजभवन में रहते थे।

अनेक गुणालंकृत राजा प्रतापचन्द्र की मित्रता के कारण विद्यासागर अक्सर काँदी के राजभवन में रहा करते थे । इस बार भी राजा साहब की कड़ी बीमारी का हाल सुनकर, बहुत रुपया खर्च करके, डाकृर महेन्द्रलाल सरकार को साथ लिये, विद्यासागर काँदी पहुँचे। अच्छी चिकित्सा के द्वारा राजा साहब को आरोग्य करने की बहुत कुछ चेष्टा की, पर फल कुछ नहीं हुआ। अन्त को राजा साहब कलकत्ते चले आये।

राजा प्रतापचन्द्र ने मरने के कुछ दिन पहले विद्यासागर को अपनी सम्पत्ति का ट्रस्टी और नाबालिग पुत्रों का अभिभावक बनाने का विचार प्रकट किया था। विद्यासागर ने राजा के इस सङ्कल्प के विरुद्ध दृढ़ता के साथ अपनी सम्मति प्रकट की। बहुत चेष्टा करके भी राजा साहब उनको इस कार्य का भार नहीं सौंप सके । इसी बीच में, अन्य कोई सुव्यवस्था करने के पहले ही, काशीपुर में गङ्गा के किनारे राजासाहब स्वर्ग सिधार गये। राजावहादुर मरते समय विद्यासागर से सबकी देखरेख रखने के लिए विशेष अनुरोध कर गये।

विद्यासागर राजा के परलोकवास के बाद शोकाकुल आत्मीय की तरह उनके कारोबार की देख-रेख करते रहे । इसके लिए उन्होंने भरपूर यत्न किया कि राज- सम्पत्ति सुरक्षित रहे, उसका जमाखर्च ठीक तौर पर हो और राज- कुमार लोग ऐसी शिक्षा पावें कि अपने पिता के समान सज्जन-समाज के मुखिया बन सकें । अँगरेज़ी-राज्य की व्यवस्था से राज-सम्पत्ति की श्रीवृद्धि होने लगी।

नाबालिग राजकुमार वार्ड में न रखे जाकर घर में माता और दादी के पास रहे, इसलिए विद्यासागर को छोटे लाट. वीडन साहब से मुलाकात करनी पड़ी। उन्हीं के अनुरोध से कई सुयोग्य प्रतिष्टित बङ्गाली और अँगरेज़ राजकुमारों के अभिभावक बनाये गये।

विद्यासागरजी राजा माहब के परम मित्र थे, इससे गवर्नमेंट ने उन्हीं को प्रधान पभिभावक बनाया। संस्कृत कालेज के अध्यापक प्रेमचन्द्र तर्फवागीश के पेन्शन ले लने पर उनके भाई राममय भट्टाचार्य ने उस पद के लिए अर्जी दी। उधर स्वर्गीय महेशचन्द्र न्यायरन ने भी उस पद के लिए अर्जी भेजी। दोनों ही योग्य पुरुष थे। सब लोगों की धारणा यह थी कि भट्टा- चार्य को ही वह जगह मिलेगी। न्यायरत्नजी संस्कृत कालेज के विद्यार्थी न होने पर भी काव्य और अलङ्कार में विशेष व्युत्पन्न थे। छः दर्शनों के भी ये जानकार समझे जाते थे।

एक ग्वान्ती जगह के लिए दो पण्डितों ने अर्जी दी। अध्यक्ष कावेल माहब कुछ निश्चय न कर सकं कि किमको वह पद दें। अन्त को उन्होंने विद्यासागर से राय मांगी। विद्यासागर ने कहा-“अलङ्कार-श्रेणी में ‘काव्य- प्रकाश’ पढ़ाया जाता है। उसको पढ़ाने के लिए न्यायशास्त्र की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। मद्देशचन्द्र न्यायरब ने विधिपूर्वक न्यायशाब पड़ा है। उन्हें इस शान्त्र में विशंप व्युत्पत्ति है।

अत- एव मेरी राय से न्यायरन को ही यह जगह मिलनी चाहिए।” विद्यासागर की सिफारिश से न्यायरन ही उस जगह पर रक्खे गये। बम्बई के एक प्रतिष्टित पुरुप कलकत्ता दंग्यने के लिए आये थे । उनकं अनुरोध से विद्यासागर उन्हें साथ लेकर कलकत्ते का अजायब- घर दिखलाने गये ।

ये एशियाटिक सोसाइटी के मेम्बर की हैसियत से बहुत मर्तया इस घर में गये थे, किन्तु कभी किसी ने उनसे स्लीपर उतार- कर जाने के लिए नहीं कहा। अबकी न-जाने किस कारण वहा के दरवान ने उनसे स्लीपर उतारकर भीतर जाने के लिए कहा। पता लगाने से ईश्वरचन्द्र को मालूम हुआ कि स्लीपर पहनकर अजायबघर के भीतर जाने का नियम नहीं है। लाचार विद्यासागर उन विदेशी भद्र- पुरुष को लेकर लौट आये।

उन्होंने उन भद्रपुरुप से कहा कि आपको अन्य किसी मित्र के साथ भेज दूंगा। मैं इसके भीतर न जाऊँगा। जब वे लौट आये तव वहाँ के क्यूरेटर साहब को यह हाल मालूम हुआ। उन्होंने घटनास्थल पर आकर विद्यासागर को लौटाने की बड़ी चेष्टा की, लेकिन वे नहीं लौटे। वे यह कहकर चले आये कि अब मैं इस घर में नहीं जाऊँगा। बड़े अफसरों के पास इस घटना का हाल लिख भेजने पर उन्होंने क्षमा-प्रार्थना करते हुए इस घटना पर दुःख प्रकट करके पत्र लिखा।

उन्होंने विद्या- सागर को सूचित किया कि सब समय चाहे जिस पोशाक से अजायबघर और सोसाइटी के आफिस में आप जा सकते हैं। किन्तु विद्यासागर ने इससे सन्तुष्ट न होकर लिख भेजा “मेरे लिए ख़ास नियम बनाने की ज़रूरत नहीं। सर्वसाधारण के लिए तो एक नियम हो और मेरे लिए दूसरा, यह मैं नहीं चाहता। यदि सर्व-साधारण के लिए ऐसा नियम बनना सम्भव हो तो मैं उस नियम के अनुसार जाने-माने के लिए तैयार हूँ।

अन्यथा विशेष नियम का सुयोग प्राप्त करके मैं अपने को सर्वसाधारण से अलग करना नहीं चाहता ” इस मामले में अजायबघर और एशियाटिक सोसाइटी के अफसरों से, उसके बाद बङ्गाल-गवर्नमेंट से, अन्त को इंडिया-गवर्नमेंट तक से लिखा-पढ़ी हुई लेकिन सर्वसाधारण के लिए यह नियम न वन सका।

विद्यासागरजी को सर्वसाधारण का पक्ष समर्थन करने में जब सफलता नहीं प्राप्त हुई तब उन्होंने यह प्रतिज्ञा कर ली कि अव कभी अजायवघर के फाटक पर न जाऊँगा। सन् १८८३-८४ ई० के जाड़ों में, महामति लार्ड रिपन के शासन-काल में जिस समय कलकत्ते में, आन्तर्जातिक प्रदर्शिनी हुई, उस समय लाखां विचित्र चीजें इस स्थान पर जमा हुई थीं। राय कृष्णदास पाल अदि अनेक प्रतिष्ठित पुरुषों ने नुमाइश का हाल कह- कर अनुरोध किया कि आप भी देख पाइए । विद्यासागर ने कहा “लोगों के मुँह से सुनकर और तुम्हारे अनुरोध से उत्साहित होकर मैं भी उसे एक बार देखना चाहता था। किन्तु सुना है कि प्रदर्शिनी में उसी अजायबघर के फाटक से होकर जाना पड़ता है।

मैं तो इस जीवन में उस फाटक के भीतर पैर न रक्यूँगा।” ऐसी लोकवत्सलता और प्रतिज्ञा की दृढ़ता विरले ही लोगों में पाई जाती है। विद्यासागर के मित्र हरिश्चन्द्र मुखोपाध्याय के मरने से बङ्गालियों द्वारा सम्पादित सञ्चालित अँगरेजी अखबारों की जान निकल गई थी।

उस अभाव की पूर्ति के लिए महानुभाव कालीप्रसन्नसिंह अग्रसर हुए। उन्होंने पहले अँगरेज़ सम्पादक रखकर उसके द्वारा काम चलाने की व्यवस्था की। किन्तु अन्त में विद्यासागर को उसका ट्रस्टी बनाकर उन्होंने उसके अच्छी तरह चलने का प्रवन्ध करने के लिए अनुरोध किया। विद्यासागर ने सबसे पहले शम्भु- चन्द्र मुखोपाध्याय को और पीछे से रायबहादुर कृष्णदास पाल को उस पत्र का सम्पादक बनाया। विद्यासागर की ही सहायता से हिन्दू-पेट्रियट के सम्पादक होकर स्वदेश और विदेश में कृष्णदास पाल की इतनी प्रसि और प्रतिष्ठा हुई।

इस परिवर्तन के लिए डाकृर मुखोपाध्याय महाशय सदा विद्यासागर के विरोधी बने रहे। महानुभाव कालीप्रसन्न सिंह के साथ अनेक कारणों से विद्या- सागर का अधिक मेल-जोल हो गया। सिंह महाशय की अक्षय कीति महाभारत का अनुवाद विद्यासागर की पृष्ट-पोपकता से ही हुआ। इसी कारण सिंह महाशय को इस काम में सम्पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। संस्कृत-कालेज के दूसरे खण्ड में संस्कृत-कालेज की लाइप्रेरी थी।

प्रेसीडेन्सी कालेज के अध्यक्ष ने प्रयोजन-वश उस घर को माँग लिया और नीचे के अन्ध-कूप सदृश खण्ड में उन बहुत दिनों के संगृहीत दुर्लभ संस्कृत-ग्रन्थों को रखने की आज्ञा दी। संस्कृत- कालेज के तत्कालीन अध्यक्ष प्रसन्नकुमार सर्वाधिकारी ने साहब के इस अनुचित आग्रह पर आपत्ति की।

वे भी विद्यासागर के ही ऐसे स्वभाव के आदी थे। इस बात को वे सह न सके कि संस्कृत के दुर्लभ ग्रन्थ नीचे के खण्ड में अरक्षित भाव से पड़े रहकर सड़ें। उन्होंने कह भेजा कि लाइब्रेरी का कमरा खाली करना असम्भव है। ऐसा करने से सब बहुमूल्य ग्रन्ध शीघ्र ही नष्ट हो जायेंगे। इस मामले में साहब की जीत हुई। वे जब संस्कृत की पोथियाँ नीचे उतरवाने लगे तब सर्वाधिकारीजी ने इस्तीफा देने की मन में ठानकर विद्यासागर से सलाह पूछी।

विद्यासागर ने अफसरों से यह अनुरोध किया कि दोनों आदमियों को राज़ी रखने के लिए कोई उपाय करना चाहिए किन्तु इसका कुछ फल न हुआ। सर्वाधिकारी ने इस्तोफ़ा दिया। इस इस्तीफे के लिए सञ्चालक लोग बड़े गोलमाल में पड़ गये । यह झगड़ा पराधीन बङ्गालो और श्वेत- काय राज-पुरुष का था। न्याय की दृष्टि से विचार किया जाता तो सर्वाधिकारी की ही जीत होती। उनसे यह अन्याय न देखा गया।

वे इस्तीफा देकर अलग हो गये। संस्कृत-कालेज में प्राच्य-साहित्य की रक्षा के लिए एक काले आदमी का कहना मानना बड़ा भारी हीनता का काम समझकर अफसर लोग उसके लिए राजी नहीं हुए। किन्तु दूसरी ओर, न जाने किस कारण, विद्यासागर के नाम से यह समाचार फैलने लगा कि सर्वाधिकारीजी ने विद्यासागर की सलाह से यह काम किया है। छोटे लाट वीडन साहब ने ज़बानी और गुम-पत्रों आदि के द्वारा प्रापस में झगड़ा मिटा लेने के लिए विद्यासागर से अनुरोध किया। वे पत्र और विद्यासागर ने उन पत्रों के उत्तर में जो पत्र लिखे थे उनके कुछ ज़रूरी अंशों की नकल नीचे दी जाती है.

ईश्वर चंद्र द्वारा लिखे गए इंग्लिश में पत्र

My dear Sir,

When I had the pleasure of waiting upon you last, you were pleased to allude to the resignation of the Off g. Prince- pal, Sanskrit College. But as I was not aware of all the circumstances connected with the affair, I could not tell you anything regarding the matter. I have since made myself acquainted with the facts of the case and am inclined to think that the treatment of the Principal by has been unnecessarily and unbecomingly harsh, as will, I believe, appear to you also on perusal of the papers enclosed.

I have, therefore, tried my best to persuade him to with- draw his letter of resignation. But he says ishwar Chandra Sharma. My dear Pundit. I am sorry you have not been able to induce P. C. Sar badhikari to withdraw his resignation, because I feel sure it is a step which he will hereafter regret, and I am always sorry to lose the services of good officers, specially if it be for an inadequate. cause. As to the fitness of the room for the reception of the Sanskrit Miss. I will make inquiry. Believe me, yours sincerely, Cecil. Brad-ox.

Thank you- Ishwar Sharma

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Summary

यह पूरी कहानी नहीं है बल्कि यह इस पूरी कहानी का सिर्फ भाग 1 है, आपको पता ही है की इस कहानी का बहोत ही बड़े होने के कारन इसे तीन विभागों में बाटा गया है, पर आप चिंता न करे आपको बाकि के दो विभाग यहाँ मिल जायेंगे।

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