“विषय” हिंदी नैतिक कहानी – Hindi Moral Story Part 2

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“विषय” बच्चो के लिए हिंदी नैतिक कहानी भाग 2

ईश्वर चंद्र द्वारा लिखे गए इंग्लिश में पत्र

My dear Sir,

As I am inclined to suspect that he may have also represented the matter to you in the same light, I beg to assure you that I had no hand whatever in inducing Babu P. C.

Sarb adhikari in forming his resolution. On the contrary, as I was under the impression that the severance of his connection with the Sanskrit College would be injurious to that institution, I tried my best to make him withdraw his resignation.

ISHWAR CHANDRA.

My dear Sir,

You may be quite sure that if I had had the last suspicion that Babu P. C. Sarbadhikari and acted under your advice in resigning his appointment in Sanskrit College, I should not have asked you to try and induce him to reconsider what I thought a lastly and unasked for step. Yours sincerely, Cicu. Bravox.

ISHWAR CHANDRA.

विद्यासागर के कहने से ही सर्वाधिकारी ने इस्तीफा दिया है, इस निन्दावाद का सन्देह करके छोटे लाट वीडन साहब को विद्या- सागर ने जो पत्र लिखा था उसका भी कुछ अंश ऊपर उद्धृत कर दिया गया है। कलकत्ते के एक प्रतिष्टित घराने के दो भाई पैतृक-सम्पत्ति के हिस्से-बांट के लिए मुकद्दमेबाज़ी करने पर आमादा हो गये। हाई- कोर्ट के वकील-बैरिस्टर धनराशि को हथियाने लगे। विद्यासागरजी किसी कारण उन लोगों पर पहले ही से नाराज़ थे। तथापि उस समय स्वतः प्रवृत्त होकर वे उनका झगड़ा मिटाने के लिए अग्रसर हुए।

विद्यासागर की मंशा यही थी कि इन लोगों का रुपया व्यर्थ न लुटे। दोनों भाइयों ने यह स्वीकार किया कि हम विद्यासागर के फैसले को शिरोधार्य समझो। तब विद्यासागर हिस्सा-याँट करने लगे। विद्या- सागर के फैसले पर बड़ाभाई राजी होगया। किन्तु छोटे भाई पर अनु- ग्रह करके उसे कुछ अधिक हिस्सा देने पर भी वह राजी नहीं हुआ। वह और भी कुछ चीज़ों में अधिक हिस्ला नाँगने लगा ।

विद्यासागर ने कहा-“तुनका छोटा समझकर तुम पर विशेप अनुग्रह दिखलाया गया है। इससे अधिक कुछ देने से तुम्हारे दादा के साथ अन्याय और अविचार होगा। इससे अधिक मैं दे नहीं सकता।” छोटे भाई की अनुचित ज़िद के कारण थोड़े से जवाहरात के लिए हिस्से- बाँट का काम होकर भी अधूरा ही रह गया । अन्त को राज्य के किसी उच्चपदस्थ कर्मचारी ने विद्यासागर की व्यवस्था में ज़रा हेर-फेर करके फैसला कर दिया। वर्दवान जिले के अन्तर्गत चकदीधी-निवासी प्रसिद्ध ज़मींदार- परिवार के साथ विद्यासागर की विशेष आत्मीयता थी।

उक्त ज़मीं- दार-परिवार के प्रधान शारदाप्रसाद राय के साथ विद्यासागर की आत्मीयता का चिह्नस्वरूप चकदीधी का अँगरेज़ी स्कूल अभी तक मौजूद है। यहाँ के पुण्यार्थ औषधालय के सञ्चालन का भार जिनके ऊपर था उनमें विद्यासागर एक प्रधान पुरुष थे।

विद्यासागर ने इस ज़मीदार-परिवार की सम्पत्ति की रक्षा और उन्नति करने में समय-समय पर यथेष्ट सहायता पहुँचाई है। सियारसोल की रानी हरसुन्दरी देवी के पिता के साथ विद्या- सागर का बड़ा हेलमेल था। इस कारण वे रानी की सम्पत्ति की रक्षा और कुशलकामना किया करते थे।

ज़रूरत पड़ने पर अच्छी सलाह देकर कर्त्तव्य का मार्ग दिखला देते थे। इधर तो वे प्रति- .ष्टित धनी लोगों की सम्पत्ति और सम्मान की रक्षा करने के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करते थे और उधर हमेशा दीन-दुखियों से सहानुभूति दिखाकर उनके दुःख दूर करना उनका नित्य का काम यह भी विद्यासागर की एक विशेषता थी। एक बार मेडिकल-कालेज के बँगला-विभाग (वर्तमान कैम्वेल- स्कूल ) के तत्कालीन अध्यक्ष ने छात्रों को मेकाले-वर्णित कुछ एक सुमिष्ट विशेपणों से याद किया। भक्ति-भाजन स्वर्गीय विजयकृष्ण गोस्वामी इस समय मंडिकल-कालेज के बँगला-विभाग में पढ़ते थे ।

उन्होंने और अन्य कई छात्रों ने अध्यक्ष के ऐसे बुरे वर्ताव से दुःखित हो, दल बाँधकर, छोटे लाट के पास अध्यक्ष के ऐसे बुरे व्यवहार के कारण अपना स्कूल छोड़ देने का इरादा ज़ाहिर करके एक अर्जी भेजी। बालकों ने दलबद्ध होकर गालदीघी के मैदान में सभा करके यह प्रतिज्ञा की कि जब तक साहव अपने अपराध को स्वीकार करके क्षमाप्रार्थना न करें तब तक हम लोग स्कूल नहीं जायेंगे ।

अधिकांश वालक ऐसे थे जो इस स्कूल से मिलनेवाली छात्रवृत्ति से गुज़ारा करके पढ़ते-लिखते थे। वृत्ति मिलना चन्द हो जाने से उनको कष्ट मिलने लगा। तव अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के बारे में सहायता मांगने के लिए सव छात्र विद्यासागर के पास पहुँचे। विद्यासागर पहले ही सब हाल सुन चुके थे। उन्होंने पहले समझा-बुझाकर छात्रों को स्कूल भेजने की चेष्टा की। विजयकृष्ण गोस्वामी सबके मुखिया थे।

उन्होंने विद्यासागर को यह समझा दिया कि सच छात्र सुभीते की अपेक्षा इज्ज़त को ही आदर की दृष्टि से देखते हैं विद्यासागर ने छोटे लाट के पास जाकर उनकी प्रार्थना जताई अनुसन्धान होने के बाद अध्यक्ष के द्वारा बालकों को बुलवाकर विद्यासागर ने मब झगड़ा तय करा दिया।

दो-तीन महीने तक छात्रवृत्ति वन्द रहने से बहुत से बालकों पर मुसीवत आ पड़ी थी। विद्यासागर ने बहुत सा रुपया खर्च करके उन लोगों की सहायता की। इसी समय से विद्यासागरजी विजयकृष्ण गोस्वामी महाशय को विशेष स्नेह और सम्मान की दृष्टि से देखने लगे । विद्यासागर के एक प्रतिष्ठित ज़मींदार मित्र के घर के पास एक मोदी रहता था । उससे विद्यासागर की पहले की जान-पहचान थी।

एक दफ़ा विद्यासागर उधर से जा रहे थे। उस मोदी ने उनको आदर करके बुलाया। उसकी मीठी वातों से प्रसन्न विद्यासागर दूकान के नीचे एक चटाई के टुकड़े पर बैठे हुए उससे बातें कर रहे थे। इसी समय विद्यासागर के मित्र ज़मींदार वावू फ़िटन गाड़ी पर बैठे शाम को हवा खाने जा रहे थे। जिस सड़क के किनारे, दूकान के आगे, विद्यासागर बैठे थे उसी सड़क पर उनकी फ़िटन भी जा रही थी।

विद्यासागर को देखकर वे बड़े असमन्जस में पड़े। एक तरफ़ विद्यासागर की उपेक्षा करके उनसे साहव-सलामत किये बिना चले जाना जैसे असम्भव था, वैसे ही दूसरी तरफ़ उस मामूली मोदो की दूकान पर हुए विद्यासागर को प्रणाम और प्रतिष्ठा करना भी वे अपने समान प्रतिष्ठित ज़मींदार के लिए अपमान की बात समझते थे।

अन्त को उन्हें वही अपमान का काम करना पड़ा। इसके उपरान्त फिर एक वार मुलाकात होने पर विद्यासागर ने ज़मीदार वावू से कहा-“उस दिन तो तुम बड़े असमञ्जस में पड़ गये थे।” ज़मींदार बाबू ने उत्तर दिया-“आप रास्ते-गली में जहाँ-तहाँ इस तरह बैठ जाते हैं, इससे बड़ी लज्जा मालूम पड़ती है।”

वीर विद्यासागर चट बोल उठे-लज्जा मालूम पड़ती है ? मेरे साथ जान- पहचान न रखने से ही सब झगड़ा मिट जायगा, तुमको रास्ते-गली में अपदस्थ या अपमानित भी न होना पड़ेगा। वह आदमी गरीव होने से क्या तुम्हारी अपेक्षा कम आदर का पात्र हो सकता है? एक वार संस्कृत-शास्त्र-सम्वन्धी एक तर्क-वितर्क उपस्थित होने पर छोटे लाट को विद्यासागर की ज़रूरत पड़ी। खवर पाने पर विद्या- सागर ने कहला भेजा-“मैं कुछ दिन तक, पिता की मृत्यु के कारण, अत्यन्त दीन भाव से रहने का प्रण कर चुका हूँ।

मेरे मन की अवस्था और पहनावा इस समय कहीं जाने के लायक नहीं है। यदि आप इसमें अपना अपमान न समझे तो मै नङ्ग बदन वेलवेडियर-भवन में आपसे मुलाकात कर सकता हूँ।” ग़रज़ बड़ी बुरी होती है। छोटे लाट ने आने के लिए अनुरोध करके कहला भेजा-“आप जिस तरह चाहें आ सकते हैं। मुझको कुछ आपत्ति नहीं है।”

नङ्ग पैर और नङ्गे बदन विद्यासागर, वीर की तरह निर्भीक भावसे, छोटे लाट के भवन में उपस्थित हुए और जो कुछ समझाना था वह समझा- कर चले आये। हैट, कोट, पतलून, चोगा, चपकन धारण करनेवाले क्या इससे अधिक जातीय भाव को-हिन्दू आदर्श को-निवाह सकते हैं ? इतने पर भी विद्यासागर समाज-संस्कार के पक्षपाती थे। पाठकगण, अब आप ही विचारिए कि उनका समाज-संस्कार का उच्च आदर्श का था।

ब्राह्म-समाज में जातीय भाव की रक्षा नहीं होती, इससे उन्हें भीतर ही भीतर वड़ा क्लेश होता था। लेश का कारण यह था कि वे अन्य दस आदमियों की तरह ब्राम-समाज को अप्रिय दृष्टि से-निन्दा की नज़र से या शत्रु-भाव से नहीं देखते थे। उन्हें ब्राह्म-समाज से ही जातीय-जीवन के पुनरुत्थान की अाशा थी। श्रद्धास्पद राजनारायण बाबू के साथ बातचीत करते समय एक वार उन्होंने कहा था “पाप लोग (आदि-ब्राह्म-समाज ) एक गली के भीतर पड़े हुए हैं।

उस गली को एक और हिन्दू लोग और दूसरी ओर अत्यन्त आगे जाने- वाले ब्राह्म लोग दबाये हुए हैं। वे ब्राह्म-समाज पर हार्दिक प्रेम रखते थे। प्रेम रखते थे, इसी लिए जब ज़रूरत पड़ी है तब उन्होंने ब्राह्म-समाज का पक्ष लिया है। जिस समय ब्राह्म-विवाह-विधि के लिए देश में भारी हलचल मची हुई थी, जिस समय चारों ओर की.

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Summary

यह पूरी कहानी नहीं है बल्कि यह इस पूरी कहानी का सिर्फ भाग 2 है, आपको पता ही है की इस कहानी का बहोत ही बड़े होने के कारन इसे तीन विभागों में बाटा गया है, पर आप चिंता न करे आपको बाकि के दो विभाग यहाँ मिल जायेंगे।

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