“विषय” हिंदी नैतिक कहानी – Hindi Moral Story Part 3

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“विषय” बच्चो के लिए हिंदी नैतिक कहानी भाग 3

हम सबने आपत्ति के कारण वर्तमान ब्राह्मविवाह-आईन ने किम्भूत-वि.माकार रूप धारण किया था, उस घोरतर आपत्ति और आन्दोलन के समय विद्यासागर ने आईन के अनुकूल अपनी सम्मति दी थी। सन् १८७२ ई० के ३ आईन बनाने के पक्ष में उन्होंने अपनी अनु- कूल सम्मति दी थी। काशी की अध्यापक-मण्डली से, आईन के लिए प्रार्थना करनेवाले, ब्राझ लोगों के अनुकूल व्यवस्था लाने के लिए लोगों के अनुरोध करने पर उन्होंने डाक्टर लोकनाथ मैत्र को जो पत्र लिखा था उसका कुछ अंश यह है-“मेरी समझ में इस तरह का आईन पास होना उचित और आवश्यक है। ब्राह्म-मत के अनुसार बीच-बीच में विवाह होते हैं।

नवीन ब्राह्मों ने मुझसे और अन्य कई पण्डितों से व्यवस्था माँगी है। व्यवस्था लिख दी है।” एक समय भारतवर्षीय ब्राह्म-समाज में धन की कमी से उसके पाक्षिक समाचार-पत्र धर्मतत्त्व का प्रचार कठिन हो गया था। विद्या- सागर ने खुद उसकी कई संख्याएँ छापने का भार ग्रहण किया था। इस उपलक्ष में कृतज्ञता प्रकट करते हुए १७६१ शकाब्द के पहले आषाढ़ की संख्या में प्रकाशित हुआ था -“देशहितैषी श्रीयुत पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने, बहुत दिन हुए, धर्मतत्त्व पत्रिका की दो संख्याएँ अपने प्रेस में छाप दो थीं।”

ब्राह्म-समाज के गण्य मान्य पुरुपों में से अनेक के साथ उनका विशेष हेलमेल था। पूज्यपाद रामतनु लाहिड़ो को वे अपना परम आत्मीय समझते थे। लाहिडीजी जब जिस बात के लिए अनुरोध करते थे वह बात विद्यासागर पूरी करते थे। विद्यासागर उन्हें बड़ी श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे। विद्यासागर से कोई काम कराने के लिए जब सब लोग चेष्टा करके हार जाते थे तब भी लाहिड़ी महाशय का अनुरोध खाली नहीं जाता था।

श्रद्धा- स्पद श्रीयुत राजनारायण वसु, पूज्यपाद श्रीयुत देवेन्द्रनाथ ठाकुर श्रादि उस समय के प्राचीन लोगों पर जैसे उनको प्रेम और श्रद्धा थी वैसेही नव्य दल के अगुआ लोगों पर भी वे स्नेह और प्रीति रखते सब बातों में मत न मिलने पर भी स्वर्गीय केशवचन्द्र सेन का वे चड़ा आदर करते थे। हर साल माघोत्सव के समय भारतवर्षीय ब्राहा-समाज के उत्सव का निमन्त्रणपत्र और प्रोग्राम उनके पास प्राता था। पण्डित विजयकृष्ण गोस्वामी को भी वे बड़े स्नेह की दृष्टि से देखते थे। पण्डित शिवनाथ शाली को वे पुत्र के समान मानते थे।

बाबू दुर्गामोहन दास भी उनको बहुत प्यारे । बाबू दुर्गामोहन दास के शेप विवाह की सब ओर तीव्र समालोचना हो रही थी उस समय उनके परम मित्र विद्यासागर ने विवाह के समाचार से सन्तुष्ट होकर उनको यह पत्र लिखा था- श्रीश्रीहरिः शरणम्। प्रिय भाई, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हुआ, इस समाचार से मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ। मेरी आन्तरिक कामना और प्रार्थना यह है कि तुम जब तक जियो, नववधू के साथ सुख से रहो। अपनी नववधू को मेरा आशीर्वाद और स्नेह सम्भापण जताना। इति २ ज्येष्ठ, सन् १२६८।

विद्यासागर ऐसे उदार, उच्च हृदय और गहरी सहृदयता को लेकर उत्पन्न हुए थे कि सदा सवको सुखी बनाने और सवको सुखी देखने ही में सन्तुष्ट रहते थे। इसी से वे सदा मनुष्य के स्वाधीन हृदय के-आज़ादी के पक्षपाती थे। सम्प्रदाय, शास्त्र और विधि जहाँ मनुष्य के अनुकूल होते थे वहाँ वे भी उनका समाज और पक्ष लेते थे । और जहाँ समाज, सम्प्रदाय और शास्त्र-विधि मनुष्य के न्यायतः प्राप्य सुख के विरोधी होते थे वहाँ वे भी उनके घोर शत्रु थे!

विद्यासागर स्वयं कर्त्तव्यपरायण आदमी थे। इसी से किसी को अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन देखकर-न्याय-मार्ग से भ्रष्ट होते देखकर, जिसके प्रति जैसा व्यवहार होना चाहिए उसके विपरीत व्यवहार को देखकर-वे क्षोभ और क्रोध से जल उठते थे। यहाँ तक कि ऐसी किसी-किसी घटना के अवसर पर उनका धैर्य जाता रहता था। यह वात उनकी महिमामयी प्रतिष्ठा के लिए ‘चन्द्रमा में कलङ्क’ कही जा सकती है।

मदनमोहन तर्कालङ्कार के साथ वचपन से विद्यासागर का भाईचारा था। नौकरी-चाकरी के बाद संस्कृत-प्रेस के लिए दोनों में वैमनस्य हो गया। यह वैमनस्य यहाँ तक बढ़ गया कि विद्या- सागर ने उनके साथ सब तरह का सम्बन्ध त्याग देने का अभिप्राय जताकर, पत्र लिखा। इसके अनुसार संस्कृत-प्रेस और उसमें छपी हुई पुस्तकों के वटवारे का काम समाप्त हो जाने पर तर्कालङ्कार की लिखी हुई ‘शिशु-शिक्षा’ पुस्तक के तीनों भाग विद्यासागर के हिस्से में आ गये। विद्यासागरजी तर्कालङ्कार की माता, स्त्री और विधवा कन्याओं में से हर एक की १० महीने की सहायता करते थे।

तर्कालङ्कार के परिवार को धन की कमी के कारण समय- समय पर अत्यन्त क्लेश मिलता था। तर्कालङ्कारजी के दामाद योगेन्द्रचन्द्र विद्याभूपण ने, इस विश्वास से कि शिशु-शिक्षा के तीनों भागों का खत्व मिल जाने से तर्कालङ्कार के परिवार का आर्थिक कष्ट दूर हो सकता है, विद्यासागर से कहा कि आप तर्कालङ्कार की मँझली लड़की, विधवा कुन्दमाला, को शिशु-शिक्षा का स्वत्व दे. दीजिए ।

विद्यासागर ने सच्चे दानवीर की तरह ‘तथास्तु’ कह दिया । अब यहाँ पर विचारणीय यह है कि इस ‘तथास्तु’ के विरुद्ध कार्य क्यों हुआ ? विद्यासागरजी स्वय कहते थे-“मैंने योगेन्द्र वांबू से कहा, कुन्दमाला से कहना, मैंने उसकी प्रार्थना के अनुसार. उसे ‘शिशुशिक्षा’ के तीनों भाग दे दिये।” दोनों का कहना एक है। फिर क्यों इस दान में व्यतिक्रम हुआ ? विद्यासागर की ‘निष्कृतिलाभ-प्रयास’ और योगेन्द्र बाबू की ‘निष्कृतिलाभ-प्रयास विफल’, दोनों पुस्तकें पढ़ने से मुझे यह विश्वास हुआ है कि योगेन्द्र वाबू के बहुत जल्दी मचाने से ही चिढ़कर विद्यासागर ने अपना इरादा बदल दिया।

जा हो, योगेन्द्र वावू की जल्दी और खीझ पैदा करनेवाले व्यवहार से विद्यासागर की प्रतिज्ञा का टल जाना सचमुच बड़े ही खेद की बात है। उन्होंने मुँह से जो बात निकाल डाली थी उसे, सैकड़ों तरह के कुव्यवहार होने पर भी, पूरा करना ही उनके लिए शोभा की बात थी । कारण चाहे जो हो, विद्यासागर का दान देकर अथवा दान देने की इच्छा प्रकट करके उसके अनु- कूल काम न करना खटकता है।

इस अप्रीतिकर मामले के बारे में सन्ताप की बात इतनी ही है कि उन्होंने साधारण कारण से अपनी बात को नहीं टाला। भारी मर्म-वेदना से लाचार होकर ही उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा था। विद्यासागरजी अपने सांसारिक मामलों को ऐसी निष्ठा के साथ सम्पन्न करते थे कि उनमें लेशभर भी स्वार्थपरता नहीं छू जाती थी। उन्होंने बहुत दिनों के वाद, विना माँगे ही, सूद-समेत ४६११) ५ गवर्नमेंट का रुपया अदा किया था।

गवर्नमेंट को मालूम भी न था कि यह रकम विद्यासागर पर वाकी है या नहीं। और, गवर्नमेंट के हिसाव में भी कहीं इन रुपयों का उल्लेख न था। विद्यासागर आपसे इन रुपयों को चुकाकर अपनी मनुष्यता, न्यायनिष्ठा और लोभहीनता का अत्यन्त श्रेष्ट उदाहरण छोड़ गये हैं। जिन्होंने जन्म भर पराये धन को विप की तरह समझा उनके चरित्र पर अगर कोई झूठा कलङ्क लगाने की चेष्टा करता है तो सचमुच बड़ा ही केश और क्रोध होता है। किन्तु देश-काल-पात्र को देखकर सव सह लेना पड़ता है।

अत्यन्त प्राचीन समय से ग्रीस, रोम, मिस्र और भारतवर्ष में मनुष्य-शरीर से उत्पन्न शीतला-रोग के वीज से टीका लगाकर शीतला रोग का भय दूर करने की रीति प्रचलित थी। किसी-किसी का ऐसा विश्वास है कि अत्यन्त प्राचीन समय में भारतवर्ष में गो-बीज से टीका देकर शीतला रोग का फैलना रोकने की रीति भी प्रचलित थी। पीछे अनेक कारणों से यह रीति यहाँ से उठ गई। में सन् १८६५ ई० को अँगरेज़-गवर्नमेंट ने यह नियम कर दिया कि मनुष्य-देह से उत्पन्न शीतला रोग के बीज से टीका न लगाकर गो-वीज से टीका लगाना ही श्रेयस्कर है।

किन्तु लोगों के कुसंस्कार के कारण बहुत दिनों तक इस देश में यह पद्धति प्रचलित नहीं हो सकी। विद्यासागर ने ही बहुत परिश्रम करके कृष्णनगर जाकर हिन्दु-समाज के मुखिया नदिया के महाराज श्रीशचन्द्र की सहायता से देश में अँगरेज़ी टीका जारी होने में सहायता पहुँचाई।

बङ्गाल के नीच जाति के लोग, चैत की संक्रान्ति को, देह के अनेक अङ्गों को छेदकर व्रत को समाप्त करते थे। कोई-कोई सव शरीर को क्षत-विक्षत कर डालते थे। मैंने, वचपन में, गाँवों में अपनी आँखों से यह तमाशा देखा है। ऐसे घायल होकर नाच रहे लोगों के खून से तर शरीर को देखकर हम लोग बहुत डरते थे । सन् १८६५-६६ ई० को गवर्नमेंट की आज्ञा से यह कुरीति बन्द हो विद्यासागर ने इस कुरीति को उठाने में विशेष रूप से गवर्नमेंट के पक्ष का समर्थन किया था। गई।

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Summary

यह पूरी कहानी नहीं है बल्कि यह इस पूरी कहानी का सिर्फ भाग 3 है, आपको पता ही है की इस कहानी का बहोत ही बड़े होने के कारन इसे तीन विभागों में बाटा गया है, पर आप चिंता न करे आपको बाकि के दो विभाग यहाँ मिल जायेंगे।

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