“लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 2

नमस्ते सभी दोस्तों को आपका हमारी वेबसाइट में स्वागत है जिसमे आपको हम अलग अलग विषय पर कुछ जानकरी देने की कोशिश करते है. आज हम यह पोस्ट केवल बच्चो के लिए लेके आये है. जिसमे विद्यासागर से जुडी एक और हिंदी कहानी है और मुझे विश्वाश है की आपको इसमें मजा जरूर आएंगा।

यह हिंदी नैतिक कहानी चार हिसो में है तो आपको सभी भाग यहाँ आसानी से मिल जायँगे और कोई भी भाग जहा ख़तम होता है तो उसके आगे का भाग वही से शरू होंगे तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है.

“लोक सेवा” लोकप्रिय हिंदी नैतिक कहानी भाग 2

कहानी भाग- 1 के अंत शुरू

इस वृत्ति-भाण्डार की स्थापना के बाद कई साल तक इसका काम अच्छी तरह चलता रहा। इसी समय आफ़िस के एक कर्मचारी के लिए विद्यासागर के साथ नवीन- चन्द्र की नहीं पटी। इस घटना से ईश्वरचन्द्र को ऐसी विरक्ति और अप्रसन्नता हुई कि फिर वे किसी तरह मिलकर काम करने के लिए. राजो नहीं हुए। अन्त को उन्होंने सव सम्बन्ध त्याग करने का पक्का इरादा करके उसके सेक्रेटरी नवीनचन्द्र सेन को अपनी इच्छा जताई।

इस समाचार से सव लोग बहुत ही दुःखित हुए। सबने मिलकर विद्यासागर का विचार बदलने के लिए चेष्टा की किन्तु कुछ, भी फल नहीं हुआ। उनके सम्बन्ध छोड़ देने पर सर महाराज यतीन्द्रमोहन और सर रमेशचन्द्र ने फण्ड के ट्रस्टी का पद छोड़ दिया। और सबके सिर पर वज्रपात सा हो गया।

किन्तु विधाता की कृपा से धीरे-धीरे सव आशङ्का दूर हो गई। वह वृत्ति-भाण्डार अभी तक चल रहा है और उससे असंख्य दुखी और विपत्ति-प्रस्त पुरुषों का निर्वाह होता है। विद्यासागर ने व्यक्तिगत झगड़े से खीझकर अपने स्थापित वृत्ति-भाण्डार का सम्वन्ध त्यागकर अच्छा नहीं किया। उनके ऐसे आदमी का अपने बुद्धिविवेचन के ऊपर निर्भर करके काम करना स्वाभाविक ही था। विद्यासागरजी किसी का ज़रा भी दवाव न सह सकते थे। हमारे देश के लोग यह वात अभी तक नहीं सीखे कि विद्यासागर ऐसे प्रतिभाशाली आदमी की दा-एक वातें मानकर उसकी सहायता से साधारण अनुष्ठानों की उन्नति और श्रीवृद्धि होने देना चाहिए।

उधर वे भी दस आदमियों का हठ मानकर उनके साथ मिलकर काम न कर सकते थे। दस आदमियों से मिलकर काम करने पर उनको विश्वास न था, इससे प्रायः वे अकेले ही काम करते थे और जिस काम में हाथ डालते उसी में प्राय: उन्हें सफलता प्राप्त होती थी। उनके रचे हुए ग्रन्थ, उनका स्थापित संस्कृत-प्रेस और संस्कृत-प्रेस डिपोज़ीटरी जव उनकी जीविका का प्रधान हारा था तब मधुसूदन के ऋण की ज़िम्मेदारी से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने प्रेस का हिस्सा वेच डाला था। डिपोज़ोटरी का काम वे खुद न देखते थे।

अनेक विशृङ्खलाओं के कारण एक समय बहुत ही खीझकर उन्होंने डिपोज़ोटरी का स्वत्व वेच डालने का इरादा किया था। इस प्रकार विद्यासागर के खेद प्रकट करने पर उनके परम आत्मीय ‘कृष्णनगर-निवासी ब्रजनाथ मुखोपाध्याय ने कहा-“आप अगर एक दिन असन्तुष्ट न होकर उसका खत्व दें तो मैं उसे लेकर आपके मन के माफ़िक चला सकता हूँ” जिस सम्पत्ति को बेचकर वे उसी दम कई हज़ार रुपये पा सकते थे, जिस सम्पत्ति को खरीदने के लिए दूसरे दिन अनेक लोगों ने अनेक चेष्टाएं की वह सम्पत्ति उन्होंने वात ही बात में ब्रज बाबू को मुफ़ दे डाली।

कहा-“अच्छा आप ही को देता हूँ।” यह बात होने के दूसरे दिन सबेरे अनेक लोगों ने हज़ारों रुपये देकर उसे खरीदना चाहा। लेकिन विद्यासागर ने अपनी बात नहीं बदली। कहा-उसके २०००० रुपये भी कोई दे तो मैं नहीं ले सकता । मैं तो दे चुका । हमारे देश में उनकी अपेक्षा धनी लोगों की संख्या कम नहीं है। किन्तु डाकृर महेन्द्रलाल सरकार ने जिस समय विज्ञान की चर्चा के लिए भारत-सभा स्थापित की थी उस समय अनेक धनी लोगों की अपेक्षा उन्हीं ने अधिक चन्दा दिया था।

उन्होंने ज्ञान और शिक्षा के प्रचार के लिए इस शुभ कार्य में १०००) रु० की सहायता की थी। एक वार बर्दवान से वीरसिंह जाते समय एक जगह पालकी रखी जाने पर एक बालक विद्यासागर के पास आकर खड़ा हो गया। बालकों को प्यार करनेवाले विद्यासागर की दृष्टि पड़ते ही उस बालक ने कहा-“बाबू एक पैसा दीजिएगा ?” विद्यासागर ने कहा-“एक पैसा क्या करेगा?” उत्तर मिला-“खाने को ख़रीदकर खाऊँगा।

विद्यासागर ने कहा-“और अगर दो पैसे दूँ ?” उत्तर मिला- “तो एक पैसा आज और एक पैसा कल खाऊँगा। विद्यासागर ने कहा-“और अगर चार पैसे दूँ ?” उत्तर मिला-“तो बाज़ार से आम खरीद कर बेचूंगा। जो मुनाफ़ा होगा वह खाऊँगा और पूँजी से रोज़गार करूँगा।” विद्यासागर ने बालक की बातों से खुश होकर उसे अधिक पैसे दिये और कह गये “इस रकम को अगर तू बढ़ा सकेगा तो रुपये देकर मैं तुझको दूकान करा दूंगा।”

विद्या- सागर ने दोबारा यह देखकर कि उस बालक ने पैसों से रुपया कर लिया है, उसे दूकान करा दी और उसके व्याह का सारा खर्च उठाया। मेट्रोपोलोटन कालेज में विना फोस दिये पढ़नेवाले बालकों की संख्या बहुत अधिक थी। जिसने किसी प्रकार के सन्तोप-जनक प्रमाण के साथ अपनी गरीबी जवाकर उनसे प्रार्थना की वही कालेज में शिक्षा पाने लगा। केवल शिक्षा का प्रवन्ध करके ही उन्हें फुर्सत नहीं मिली, किसी-किसी बालक को वस्त्र और भोजन भी देना पड़ता था।

इस तरह गरीब विद्यार्थियों की सहायता करने में कभी-कभी उन्हें धोखा भी दिया जाता था। उनकी माता के स्वर्ग- बास के बाद केवल मातृहीन बतलाने से अनेक वालकों की वे सहा- यता करने लगे थे। दो-तीन बालकों ने “हमारे माता नहीं है” कहकर सहायता प्राप्त कर ली। किन्तु अब विद्यासागर को कुछ सन्देह हुआ। पता लगाने से मालुम हुआ कि पास ही जिस मोदी की दूकान थी उसने, जब देखा कि मात्रहीन वतलाकर एक बालक सहायता पा रहा है तब, और बालकों को भी ऐसा कहने के लिए सिखला दिया।

उसके यहाँ से विद्यासागर सीधा दिला दिया करते थे। कलकत्ते के एक प्रतिष्ठित पुरुप के अनुरोध से विद्यासागर ने एक अनाथ बालक को स्कूल में मुफ़ पढ़ने के लिए अनुमति दे दी । कुछ दिनों बाद स्कूल में जाकर टिफ़िन के समय देखा कि वह सुन्दर बालक कोमती कपड़े पहने हुए इधर-उधर घूम रहा है। पहले विश्वास नहीं हुआ। पीछे अनुसन्धान करने से मालूम हुआ कि यह वही बालक है ।

किन्तु उस समय भी विद्यासागर को कुछ बुरा नहीं मालुम हुआ। क्योंकि वे उस बालक को घे-माँ-बाप का अनाथ ही समझते थे। उन्होंने यह समझा कि पहले जब अच्छी हालत थी तव के ये कपड़े हो सकते हैं। किन्तु जब उन्होंने उसे दूध पीते और मिठाई खाते देखा तब पता लगाकर जाना कि जिन धनी मित्र ने इस अनाथ बालक के लिए उनसे सिफारिश की थी और जिनके अनुरोध पर विश्वास करके उन्होंने इस बालक की मुफ़ शिक्षा का प्रवन्ध कर दिया था वही सुपरिचित प्रतिष्ठित पुरुप इस बालक के वहनाई हैं।

विद्यासागर के मुँह से यह घटना और उन प्रतिष्ठित महाशय का नाम सुनकर मैंने भी देश के लोगों की नीचता का स्मरण करके लज्जा और क्षोभ से सिर नीचा कर लिया था। यह तो असम्भव नहीं है कि गरीव आदमी गरीवी की हालत में अपनी ज़रूरत के लिए किसी को धोखा दे; किन्तु किसी अमीर का अपने साले को मुफ़ शिक्षा दिलाने के लिए ऐसी दगावाज़ी करना समझ में नहीं आता। ये महाशय मरते समय लाखों रुपये की सम्पत्ति छोड़ गये हैं जिन्होंने विद्यासागर से यह ठग-विद्या की थी। विद्यासागर की दीनवत्सलता के साथ अनेक लोगों ने इसी तरह की दग़ावाज़ियाँ की हैं।

एक बार एक बालक ने स्कूल की किसी निम्नश्रेणी का पता देकर उत्तर-पाड़ा स्कूल से विद्यासागर को एक चिट्ठी लिखी। उस पत्र का भाव यह था “मैं वे-मा-बाप का गरीव लड़का हूँ। संसार में मेरे कोई नहीं है । दूसरे के घर मुट्ठी भर भात खाकर बड़े कष्ट से लिखना-पढ़ना सीखता हूँ। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि कलकत्ते आकर श्रीचरणों के दर्शन करूँ। अगर दया करके निम्नलिखित पुस्तकें भेज दीजिए तो मैं निश्चिन्त होकर एक साल तक लिख-पढ़ सकता हूँ।”

पत्र की लिखावट पर विश्वास करके कुछ पुस्तकें औरों की खरीदकर और कुछ पुस्तकें अपनी रख कर, अपने पास से डाकखर्च देकर, विद्यासागर ने उसी पते पर भेज दी। हर साल वह वालक इसी तरह “मैं ऊँचे दर्जे में चढ़ गया हूँ’ कहकर उस उस दर्जे की पुस्तकें विद्यासागर से मुफ्त मँगाने लगा । जिस साल उस बालक की स्कूल की पढ़ाई समाप्त होनेवाली थी उस साल उत्तरपाड़ा स्कूल के हेडमास्टर विद्यासागर से मुलाकात करने आये।

प्रसङ्गवश विद्यासागर ने उनसे पूछा-“इस नाम का वालक इस साल तुम्हारे यहाँ प्रथम श्रेणी में पढ़ता है। वह लड़का पढ़ने-लिखने में कैसा है ?” हेडमास्टर ने कहा-“कहाँ, इस नाम का लड़का तो मेरे यहाँ पहली या दूसरी श्रेणी में नहीं पढ़ता ” विद्यासागर ने दिल्लगी के तौर पर कहा-“तुम तो बड़े अच्छे हेडमास्टर हो, एक लड़का पाँचवें दर्जे से हर साल उन्नति करता हुआ इस समय पहली श्रेणी में पढ़ता है।

और तुम कहते हो कि इस नाम का कोई लड़का ही स्कूल में नहीं ! तुम क्या सब लड़कों को नहीं पहचानते ? वह लड़का हर साल मुझसे कोर्स की पुस्तकें मँगाता है। मैंने उसको स्कूल के पते पर पुस्तकें भेजी है और उसने पाई हैं।” मास्टर साहब बहुत ही भले आदमी थे और विद्यासागर पर बड़ी अद्धा रखते थे। उन्होंने अधिक कुछ न कहकर इतना ही कहा-“अच्छा, मैं पता लगाकर कल आपसे कहूँगा।

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Summary

आपको अब तक शायद पता चल गया होनहा की विद्यासागर से जुडी हमारी सभी नैतिक कहानी या या कोई भी किस्सा और बोध कथा बहोत ही बड़ी होती है. इसी लिए हमने सभी नैतिक कहानियों को अलग अलग विभाग में बाटा हुआ है, जिससे की आपको पढ़ने में भी काफी आसानी हो और आपको बोरिंग न लगे. नाकि दूसरा हमारा कोई ध्येय नहीं है.

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