“लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 3

नमस्ते सभी दोस्तों को आपका हमारी वेबसाइट में स्वागत है जिसमे आपको हम अलग अलग विषय पर कुछ जानकरी देने की कोशिश करते है. आज हम यह पोस्ट केवल बच्चो के लिए लेके आये है. जिसमे विद्यासागर से जुडी एक और हिंदी कहानी है और मुझे विश्वाश है की आपको इसमें मजा जरूर आएंगा।

यह हिंदी नैतिक कहानी चार हिसो में है तो आपको सभी भाग यहाँ आसानी से मिल जायँगे और कोई भी भाग जहा ख़तम होता है तो उसके आगे का भाग वही से शरू होंगे तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है.

“लोक सेवा” लोकप्रिय हिंदी नैतिक कहानी भाग 3

कहानी भाग- 2 के अंत शुरू

हो सकता है कि लड़के के दो नाम हों।” दूसरे दिन हेडमास्टर ने पहले दर्जे से लेकर अन्त तक सब दजों में अनुसन्धान किया किन्तु उस नाम का कोई लड़का न मिला। यह मालूम हुआ कि उस नाम का एक बुक्सेलर स्कूल के पास ही पुस्तक, काग़ज़, कलम आदि बेचता है। अधिक कहने-सुनने पर उसने स्वीकार किया कि इस तरह दगावाज़ी करके हर साल विद्यासागर . से पुस्तकें मँगाकर मैंने वेच ली हैं।

विद्यासागर ने इस घटना के उल्लेख के समय दुःख करके कहा था कि जिस देश के बालक ऐसे दगाबाज़ हैं उस देश की उन्नति सहज में नहीं हो सकती। लोग माता-पिता के श्राद्ध के लिए, कन्या के विवाह के लिए, अपने किये कर्ज़ को चुकाने के लिए, खाने पीने; पहनने के लिए, बरा- वर उनसे सहायता पाया करते थे। ऐसी सहायता पानेवाले व्यक्तियों को असीसते और धन्यवाद देते मैंने खुद देखा है। एक प्रतिष्ठित पुरुप सङ्कट की अवस्था में पड़कर विद्यासागर के शरणागत हुए थे । उन्होंने उनके भारी परिवार का खर्च बहुत दिनों तक चलाया था। विद्यासागरजी परोपकार के लिए अपना सर्वनाश कर डालने में आगा-पीछा न करते थे।

एक बार एक भद्र पुरुप (नाटोर से पुलीस सब इन्स्पेकर) विद्यासागर के एक परिचित मित्र के साथ उनसे मिलने आय। परिचित व्यक्ति ने कहा-“कल तीसरे पहर आपसे मिलने हम लोग आये थे, मगर आपसे मुलाकात नहीं हुई। ये भद्र पुरुष बड़ी विपत्ति में पड़े हैं। एक मुकद्दमे में निर्दोप होने पर भी इनको छः महीने की सज़ा हो गई है। इन्होंने हाईकोर्ट में अपील की है। इनकी ओर से ७००) रु. पर एक पेशी के लिए मनोमोहन घोष वैरिस्टर नियत किये गये हैं। घर से कल रुपये आनेवाले थे, किन्तु नहीं आये।

आज मुकद्दमे की सुनवाई का पहला दिन है। आप अनुग्रह करके घोप महाशय को एक पत्र लिख दीजिए कि वे आज का काम कर दें। इस बीच में रुपया आ जायगा और उनको दे दिया जायगा। एक हफ़ के भीतर रुपया अवश्य आ जायगा ।” विद्या- सागर ने सब हाल सुनकर घड़ी भर चुप रहकर कहा-यह काम मुझसे न होगा। एक आदमी का एक पैर जेलखाने के भीतर और एक पैर बाहर है।

रुपया बाको रखकर उसका काम करने के लिए अनुरोध करना ठीक नहीं मालूम पड़ता। और वही क्या कहेंगे ? जिस समय घोप बाबू विलायत गये थे उसी समय की मेरी उनकी जान-पहचान है। उसके बाद उनसे बहुत मेलजोल नहीं रहा। ऐसी अवस्था में सहसा इस तरह का अनुरोध कर भेजना क्या ठीक होगा? तुम्ही घोप महाशय से इनका हाल क्यों नहीं कहते ? सुनता हूँ, वे तो परोपकारी और विपन्न पुरुपों के हितैपी हैं। इतने दिनों तक अगर किसी वात के लिए मैंने उनसे अनुरोध किया होता तो आज निःसङ्कोच होकर उनसे यह बात कह सकता।

विपन्न भद्र पुरुष यह सुनकर आँखों में आँसू भरकर कहने लगे- “सुना है, जिसको कहीं आश्रय नहीं उसे यहाँ आश्रय मिलता है। किन्तु मुझे यहाँ भी आश्रय नहीं मिला !” विद्यासागर के हृदय में दया का सागर उमड़ पड़ा। वे घोप महाशय को पत्र लिखने बैठे। “My Dear Ghose” तक लिखकर कलम रुक गई। एक मिनट, दो मिनट, इसी तरह कई मिनट बीत गये । तव विद्यासागर ने कहा-“नहीं, यह काम मुझसे न होगा।” विपन्न भंद्र पुरुप ने रोते- रोते कहा-“क्या मैं फिर जेल ही जाऊँगा ?” सङ्कट में पड़े हुए भद्र पुरुष के इन हताश वाक्यों ने फिर विद्यासागर को विचलित कर दिया। पाठक, सुनना चाहते हो कि उन्होंने दो आँसू गिराकर क्या किया ?

उस दिन विद्यासागर के पास एक कौड़ी भी न थी। उन्होंने बक्स से चेकबुक निकालकर ७००) रु० का एक चेक लिख- कर उन्हें दिया और कहा-देखो, बैंक में भी मेरा रुपया नहीं जमा है। तुम घोप बाबू को जाकर यह चेक दो और कहा कि कल साढ़े ‘ग्यारह बजे के पहले यह चेक बैंक में मत भेजना। मैं आज दिन भर में, जिस तरह होगा, बैंक में इतना रुपया जमा कर दूंगा। पुण्यवल से हो या अपने पक्ष में प्रबल प्रमाण होने के कारण हो, सब-इन्सपेकर बाबू हाईकोर्ट से छूट.गये और चौथे दिन सात सौ रुपये लेकर विद्यासागर के दर्शन करने आयं ।

उनके साथ विद्या- सागर के वही परिचित मित्र थे। प्रणाम के बाद रुपये सामने रख- कर हँसते हुए सव-इन्स्पेकर ने कहा-“मैं हाईकोर्ट से छूट गया हूँ । आज घर से ये रुपयं आ गये हैं। इसी से यह सुसमाचार सुनाने आया हूँ।” विद्यासागरजी इस खबर से सन्तुष्ट होंगे, इस प्रत्याशा से मित्र-सहित दारागा बाबू विद्यासागर के मुँह की ओर देखने लगे। विद्यासागर ने कहा-“तुमने भले आदमी के लड़के होकर मुझसे छल किया, और तुम (अपने मित्र) ने परिचित होकर मुझसे चातुरी की ” दोनों आदमी दंग रह गये। थोड़ी देर बाद विद्या- सागर ने फिर कहा-“तुम पुलास में काम करत हो न ?” दारांगा- “जी हां”।

विद्यासागर-“नहीं, यह बात कभी सच नहीं हो सकती; तुम मुझसे झूठ बोले ।” दारांगा-“नहीं महाशय, आप अनुसन्धान करके जान सकते हैं । मैं नाटार का पुलीस सव-इन्स्पे- कृर है।” विद्यासागर ने कुछ मुसकिराकर कहा-“मैं इस झूट के सिवा और क्या सम.? इतने दिनों से अनेक लोग देने का वादा करके रुपया ले गये, लेकिन फिर उन्होंने सूरत नहीं दिखाई । गरीबों की और गैरों की बात नहीं कहता; यह हाल अमीरों और अपने इष्ट-मित्रों का कह रहा हूँ। जिस देश के मामूली लोग लंकर देना नहीं जानते उस देश में तुम पुलीस के दारोगा होकर चाधे ही दिन रुपये देने के लिए ले पाय हो, इस बात पर कैसे विश्वास करूँ!” दारागा वाचू इस उन पुरस्कार को पाकर सिर झुकार्य खड़े थे।

तब उनसे और अपने मित्र से बैठने के लिए कहकर दिनगी के तौर पर विद्यासागर ने कहा-“हाईकोर्ट के जज लोग अक्सर मुकद्दमा समझे विना असामी को छोड़ देते हैं। यही बात शायद तुम्हारे मुकदमे में भी हुई है। तुमको तो जेल. ही जाना उचित था। सात दिन के वादे पर रुपये लेकर जो चौथे दिन रुपये वापस दे वह पुलीस की नौकरी करके जेल न जायगा तो और कौन जायगा?” विद्यासागर वड़े रसिक पुरुष थे। रसिकता का सुयोग मिलने पर वे परिचित-अपरिचित का ख़याल न करते थे। इन भद्र पुरुप के छुटकारे के बारे में आनन्द प्रकट करके रुपये उठाते समय विद्यासागर ने कहा-“अजी, आठ आने कम क्यों दिये ?”

दारोगा वावूअप्रतिभ होकर सोचने लगे कि शायद रुपयों में कोई अठन्नी चली गई है। किन्तु विद्यासागर के मित्र समझ गये कि विद्यासागर दिल्लगी कर रहे हैं वे मुसका दिये विद्यासागर ने कहा-“मैंने जिनसे रुपये लिये थे उनको रुपये दे चुका । अब ये रुपये वैङ्क भेजूंगा तो आठ आने गाड़ी के किराये के देने पड़ेंगे । वह पैसे कौन देगा ?” थोड़ी देर तक इसी तरह दिल्लगी- मज़ाक करके विद्यासागर ने कहा-“जब आठ आने का नुक्सान किया है तब और कुछ नुक्सान करा ।” दारोगा बाबू और परिचित मित्र को उस दिन विद्यासागर के यहाँ भोजन करना पड़ा। बीमारी की हालत में विद्यासागर अक्सर फरासडाँगा में रहते थे।

एक दिन वे गङ्गा के किनारे सड़क पर टहल रहे थे। इसी समय उन्होंने देखा कि एक औरत एक बालक को गोद में लिये उसी राह पर जा रही है। लड़के को देखते-देखते विद्यासागर की दृष्टि उसके पैर पर पड़ी। विद्यासागर ने देखा, उसका एक पैर कम- ज़ोर और सूखा सा है।

पूछने पर मालूम हुआ कि पहले वालक के दोनों पैर एक से थे; किन्तु उम्र बढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे एक पैर क्षीण और कमज़ोर होकर इस अवस्था को प्राप्त हो गया है। विद्यासागर ने पूछा-“इसके कौन है ? और इसकी चिकित्सा हुई है कि नहीं?” उत्तर मिला-“इस लड़के के बाप है और उसने गरीब होकर भी इस बालक के पैर का दोष दूर करने के लिए. अपनी सव हैसियत विगाड़कर दवा की है।

अब कुछ नहीं रहा।” बालक के मा-बाप ने वालक की आरोग्यता के लिए अपना सर्वख खर्च कर डाला है, यह सुनकर विद्यासागर के क्षोभ की सीमा नहीं रही। तबीयत अच्छी न थी, लेकिन उसी अवस्था में उस चालक के घर जाकर सब हाल जानने के लिए वे तैयार हो गये। वालक के घर जाने पर उसके पिता से उनको मालूम हुआ कि उसने फरासडाँगा में रहकर वहाँ के डाक्टर और हुगली के सिविलसर्जन से चिकित्सा कगई है; लेकिन कुछ भी फल नहीं हुआ। उलटे उसका सर्वस्व इसी में लग गया और ऊपर से ऋण भी हो गया है।

तव दया की उत्तेजना से आत्मविस्मृत विद्यासागर ने देश-काल- पात्र का विचार न करके कह डाला “इस बालक को कलकत्ते ले जाकर अच्छे डाकुर को दिखलाते तो अच्छा होता।” इस अयाचित विज्ञजनाचित उपदेश को सुनकर बालक का पिता मोटी चादर ओढ़े विद्यासागर को मन ही मन पागल ठहरा रहा था। इसी समय बालक के पैर की फिर परीक्षा करके विद्यासागर ने कहा- मुझे जान पड़ता है कि मेडिकल कालेज के अस्पताल में दिखलाने से . कुछ-कुछ फायदा अवश्य होगा। तब बालक के पिता ने कहा-“कलकत्ते ले जाकर वहाँ के डाकृरखाने में दिखलाना मेरी शक्ति के बाहर है।

फिर भी विद्या- सागर ने परम आत्मीय की तरह कहा-“अच्छा, अगर कोई कलकत्ते में जाने-माने का, वहाँ रहने का, और डाकृर तथा दवा का खर्च दे तो कलकत्ते जा सकते हो कि नहीं?” चालक का पिता विद्यासागर फी बाहर की अवस्था देखकर और उनके प्रस्ताव का खयाल कर यह सोचने लगा कि क्या उत्तर दूं।

इतने में उसके द्वार पर धीरे-धीरे आदमियों की भीड़ होने लगी। यह देखकर विद्यासागर ख़बर देने के लिए उस ब्राह्मण को अपना पता बताकर शीघ्र वहाँ से चल दिये। उनके चले जाने के थोड़ी ही देर बाद भोड़ और भीड़ का कोलाहल और भी बढ़ने लगा। उस भीड़ का कोई भी आदमी विद्यासागर को नहीं पहचानता था। लेकिन विद्यासागर उस ब्राह्मण को जो अपना पता बता गये थे उसी से सब बात खुल गई उस गाँव के एक प्रतिष्ठित भद्र पुरुप ने ब्राह्मण के मुँह से सव बातें सुनकर और विद्यासागर के बतलाये पते को जानकर कहा-तुममें से कोई पहचान नहीं सका, वे विद्यासागर महाशय थे। उनके सिवा ऐसी बात और कौन कह सकता है ? तीसरे पहर जाकर उनसे मुलाकात करना।

वे जिस तरह कहें वैसा करने से अवश्य यह बालक अच्छा हो जायगा ।” उस समय चारों ओर ‘विद्या- सागर, , ‘विद्यासागर’ का शोर पड़ गया। थोड़े ही समय में विद्या- सागर का नाम और उस लड़के का लँगड़ापन गाँव में चारों ओर प्रसिद्ध हो पड़ा। बालक का पिता वालक की माता से सलाह करके शाम को विद्यासागर के बतलाये घर में उनसे मुलाकात करने गया। किन्तु वह बहुत देर तक कोई बात न कह सका। यह देखकर विद्यासागर ने समझ लिया कि वे जो कुछ छिपाना चाहते थे वह प्रकट हो गया । ये लोग समझ गये हैं कि यही विद्यासागर हैं।

तब विद्यासागरने पूछा-“तुमने क्या निश्चय किया ?’ बालक के पिता ने हाथ जोड़- कर क्षमा-प्रार्थना की और कहा “आप आज हमारे द्वार पर गये, हमने इस सौभाग्य को न जानने के कारण आपके प्रति जो अनादर का भाव प्रकट किया उसके लिए पहले क्षमा कीजिए।

उसके बाद फिर और बात होगी।” विद्यासागर ने स्वाभाविक सहृदयता के वशवर्ती होकर कहा-“तुमने तो मेरा कुछ अनादर नहीं किया, सकता। रहना होगा। इसी से तुम अपराधी भी नहीं हो। अब बताओ, तुमने क्या निश्चय किया ?” बालक के बाप ने कहा-“मेरे किये तो कुछ हो नहीं अगर आप कोई व्यवस्था कर देंगे तो उसे मैं शिरोधार्य समभुंगा तव प्रसन्न होकर विद्यासागर ने कहा-“तब तुम यहाँ का सब बन्दोबस्त करके कलकत्ते में जाने की और वहाँ कुछ दिन रहने की तैयारी करी।

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Summary

आपको अब तक शायद पता चल गया होनहा की विद्यासागर से जुडी हमारी सभी नैतिक कहानी या या कोई भी किस्सा और बोध कथा बहोत ही बड़ी होती है. इसी लिए हमने सभी नैतिक कहानियों को अलग अलग विभाग में बाटा हुआ है, जिससे की आपको पढ़ने में भी काफी आसानी हो और आपको बोरिंग न लगे. नाकि दूसरा हमारा कोई ध्येय नहीं है.

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