“लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 4

नमस्ते सभी दोस्तों को आपका हमारी वेबसाइट में स्वागत है जिसमे आपको हम अलग अलग विषय पर कुछ जानकरी देने की कोशिश करते है. आज हम यह पोस्ट केवल बच्चो के लिए लेके आये है. जिसमे विद्यासागर से जुडी एक और हिंदी कहानी है और मुझे विश्वाश है की आपको इसमें मजा जरूर आएंगा।

यह हिंदी नैतिक कहानी चार हिसो में है तो आपको सभी भाग यहाँ आसानी से मिल जायँगे और कोई भी भाग जहा ख़तम होता है तो उसके आगे का भाग वही से शरू होंगे तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है.

“लोक सेवा” लोकप्रिय हिंदी नैतिक कहानी भाग 4

कहानी भाग- 3 के अंत शुरू

मैं तुम्हारे लिए सब व्यवस्था कर आऊँगा।” तब बालक के पिता ने फिर कहा-“जी, कलकत्ते में तव तो बहुत रुपये खर्च होंगे, इतने रुपये–” दया के सागर विद्यासागर ने कहा-यह चिन्ता तुम क्यों करते हो? मैंने इस वार में उनसे एक बार पूछा था “उस बालक का पैर बिल्कुल अच्छा हो गया या नहीं ?” उन्होंने कहा-“नहीं, बिल्कुल नहीं अच्छा हुआ। लाभ इतना ही हुआ कि वह जैसा था वैसा ही रहेगा और अधिक न सूखेगा।”

मनुष्य के सुख और सुभीते पर उनकी एसी दृष्टि थी कि उनके द्वारा जो कुछ हो सकता था उसे करने के लिए वे प्राणपण से चेष्टा करते थे। मुझे मालूम है कि इस बालक की दवा, डाकृरों की फीस, मकान के किराये और भोजन आदि में चार-पाँच सौ रुपये खर्च हुए थे।

कोई भी मनुष्य सुख से रहे, इसके लिए कुछ भी ऐसा न था जो वे न दे सकते हो। कलकत्ते के और बङ्गाल के अनेक स्थानों के असंख्य दीन-दुखी लोगों की, बहुत दिन तक, उनसे ।। 1, 2, 3, 4, 5 महीने की सहायता मिलती रही है। समय-समय पर ऐसे विपन्न लोगों का दुःख दूर करने के लिए मैंने भी उनसे सिफारिश की है, और उन्होंने मेरे अनुरोध से ऐसे लोगों की बहुत दिनों तक सहायता की है।

जिन पर विद्यासागर की करुण-दृष्टि होती थी उनको केवल मासिक वृत्ति ही नहीं मिलती थी, प्रत्युत विपत्ति पड़ने पर सामयिक सहायता और दुर्गा-पूजा के अवसर पर नये कपड़े आदि भी वे पाते थे । अमीर या ग़रीब, उच्च या नीच, कोई भी भोजन के समय अथवा उस समय से कुछ पहले या पीछे उनके पास आता था तो पहले वे यही प्रश्न करते थे कि भोजन किया है या नहीं ? एक बार एक दूर का रहनेवाला आदमी कलकत्ता आदि अनेक स्थानों में खोजने के बाद खाटाड़ गया। वहाँ उसे विद्यासागर के दर्शन मिले ।

दोपहर के समय वह व्यक्ति विद्यासागर के घर के पास खड़ा हुआ उसे देख रहा था। इसी समय विद्यासागर की दृष्टि उस पर पड़ी। विद्यासागर ने उसे बुलवाया। पूछने से मालूम हुआ कि वह उन्हीं से मुलाकात करने आया है। विद्यासागर ने सबसे पहले उससे पूछा- “तुमने अभी तक भोजन किया है या नहीं ?” वह आदमी अनेक स्थानों में घूमकर, बहुत कष्ट सहकर, उनसे मुलाकात करने आया विद्यासागर के स्नेहपूर्ण सम्भाषण से उसकी आँखों में आँसू भर आये ।

विद्यासागर ने कहा-“रोते क्यों हो?” उसने कहा- “इतना केश उठाकर इतने आदमियों के पास गया, पर किसी ने भी तो यह नहीं पूछा कि तुम भोजन कर चुके हो या नहीं।” विद्या- सागर ने सबसे पहले उसके भोजन का प्रवन्ध कर दिया और उसके बाद, उसकी प्रार्थना पूर्ण की। एक बार वरीसाल के एक आदमी बड़ी पाशा करके कलकत्ते के दो बड़े आदमियों से मिलने आये। एक महाशय के यहाँ कई दिन तक दरबार करने पर भी मुलाकात नहीं हुई। तीसरे या चौधे दिन, दोपहर के समय, बारम्बार माँगने पर भी पीने के लिए पानी न मिलने से उस व्यक्ति को बड़ा क्रोध आया। वे क्रोध से काँपते और लाल- लाल किये विद्यासागर के घर पर पहुँचे ।

विद्यासागर भोजन बैठिए।” के बाद योंही नंगे, हाथ में नारियल का हुक्का लिये, नीचे द्वार पर खड़े हुए थे। उस आदमी ने आकर विरक्ति के भाव से रूखे स्वर में पूछा-“विद्यासागर से मुलाकात होगी?” विद्यासागर ने किसी दुर्घटना की कल्पना करके कहा-“हाँ होगी क्यों नहीं, आप उस आदमी ने कहा-“होगी क्यों नहीं का काम नहीं है। एक आदमी को देख लिया, अब इनको भी देखकर चल दूं। हो सके तो मुलाकात हो जाय । विद्यासागर समझ गये कि यह आदमी तपा हुआ है । तमाख पीने का अभ्यास है या नहीं, यह पूछकर उन्होंने उनको हुका दिया।

हुफा पोकर आगत व्यक्ति का मिज़ाज ज़रा नर्म होने पर विद्यासागर ने पूछा-“भाजन हुआ है या नहीं ?” उस आदमी ने कहा-“भोजन की कुछ ज़रूरत नहीं, तुम ज़रा विद्यासागर को बुला दो, उनसे भेट करके चल दूंगा।” विद्यासागर ने कहा-“भोजन न किया हो तो अभी सब प्रबन्ध हो सकता है।

विद्यासागर के इशारे से इसी बीच जलपान का प्रबन्ध हो गया था। बहुत कुछ कह-सुनकर विद्यासागर ने उसे कुछ जल- पान कराया। जलपान के बाद तमाखू पीतेपीते उस आदमी ने फिर कहा-“एक बार वुला दो तो इनको भी देख लूँ। अब भूल- कर भी ऐसी भूल न करूँगा।’ वहुत पूछने पर विद्यासागर को सब हाल मालूम हुआ। उनको यह भी मालूम हो गया कि वह अपरिचित आदमी उनसे क्यों ऐसी रूखी बातचीत कर रहा था। वार-बार मुलाकात के लिए ज़ोर देने पर विद्यासागर ने उसे अपना परिचय दिया ।

परिचय देते ही उस आदमी का भाव विलकुल बदल गया। उसने बहुत लजित होकर विद्यासागर के मुँह की ओर ताक- कर कहा-“मैं-मैं-आप-को-आपको-1 विद्यासागर ने कहा-“आपका कोई दोप नहीं है। ऐसी अवस्था में मनुष्य के मन का यही हाल हो जाता है। इसमें आपको लजित न होना चाहिए।” विद्यासागर के ऐसे बर्ताव से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर वह आदमी अपने घर गया। कोई आकर दरबान के द्वारा अपमानित न हो, इस आशङ्का से विद्यासागरजी अपने द्वार पर दरवान नहीं रखते थे। उनसे मुलाकात करनेवाला चेरोकटोक उनके पास चला जाता था। एक बार, केवल थोड़ी देर के लिए, एक नौकर को दरवान बनाकर उन्होंने द्वार पर विठलाया था।

उसका कारण था। एक बार एक प्रति ष्टत पुरुष के यहाँ विद्यासागर निमन्त्रित होकर गये । दरवाजे पर दरबान ने भीतर न जाने दिया। इस प्रकार वहाँ से अपमानित होकर विद्यासागर अपने घर लौट आये। निमन्त्रण करनेवालों को शिक्षा देने के लिए, घर आते ही, विद्यासागर ने एक नौकर को द्वार पर बिठला दिया और कहा कि किसी को मेरे हुक्म के विना इस समय भीतर न आने देना। दम भर में वे लोग आये जिनके दरवाजे पर से विद्यासागर लौट आये थे। भीतर घुसते समय नौकर ने रोका। मुलाकात नहीं हुई और उन्हें लौट जाना पड़ा। बन्धु-बान्धव और परिचित लोगों में से किसी के कुछ बीमार होने पर विद्यासागर उसकी खबर लेते थे।

सबसे पहले यही पूछते थे कि ख़र्च किस तरह चलता है ? अगर वङ्गो हे.वी तो किसी न किसी उपाय से उसकी सहायता करते थे। एक बार, बहुत बीमार हो जाने के कारण, मुझे बहुत दिन के लिए नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ी। विद्यासागर ने लोगों के मुँह से यह खबर पाकर बड़े नाती के द्वारा मुझको बुला भेजा।

श्रीयुत सुरेशचन्द्र समाजपति ने पाकर मुझसे कहा-“दादाजी ने कहा है कि अगर आपमें उठने की शक्ति हो तो ज़रा चलिए। वे बीमार हैं, नहीं तो खुद यहाँ आते।” विद्यासागर के इस स्नेह-पूर्ण बुलावे से अपने को अनुगृहीत समझकर मैं उनकी सेवा में उपस्थित हुअा। मेरे पाने की खबर पाकर उन्होंने मुझे अपने पलँग के पास बुला भेजा । मैंने झुककर चरणों में प्रणाम किया। उन्होंने पास की कुरसी पर बैठने के लिए कहा। उनका खर इतना क्षीण मालूम पड़ा कि मुझे उससे बड़ा भय और छोश हुआ। इसके बाद मेरे साथ उनकी यह बातचीत हुई. तुम अाजकल के लड़के हो, कोई बात कहते डर, शायद किसी बात से इन्सल्ट न हो जाय।

मैंने बहुत अप्रतिम होकर कहा-पापको जो पृछना हो, पूछिए। श्राप ऐसा समझेंगे तो सचमुच मुझे बड़ा क्लेश होगा। क्योंकि आपकी किसी बात को मैं उपेक्षा के योग्य नहीं समझता। तब उन्होंने कहा- सूद देकर और जगह रुपया कर्ज लेने की अपेक्षा गुझसे बिना सूद का रुपया ले लेते तो क्या हर्ज़ था ? जय सुभीता होता तब दो-दो चार-चार रुपये करके दे देते.। विद्यासागर और भी अधिक स्नेह करने लगे थे।

जव जो कुछ मैं कहता था उसे मान लेते थे। किन्तु बहुत दिनों तक लोगों के छल-कपट, ठगाही और झूठ बोलने आदि को देखकर मनुष्यों के आचरण पर उनको एक तरह की घृणा सी हो गई थी। एक और महात्मा विद्यासागर विश्वप्रेमी थे और दूसरी और उन्हें अपने सर्गों पर विश्वास नहीं रहा था। ऐसी अवस्था में मनुष्य को कैसा कष्ट होता है, मनुष्यों के निर्मम व्यवहार और निठुर आचरणों से हृदय की सरसता कहाँ तक नष्ट होती है, इस बात को वही समझ सकता है जिसने मनुष्य-जाति को प्रेम की दृष्टि से देखा हो, जिसका हृदय आकाश-सदृश अनन्त सहानुभूति के सरोवर में सराबोर हो चुका हो।

जीवन के अन्तिम भाग में विद्यासागरजी अत्यन्त आर्त भाव से अपने जीवन की जानकारी का उल्लेख करके कहते थे “इस देश का उद्धार होने में बहुत विलम्ब है। वर्तमान प्रकृति और प्रवृत्ति के मनुष्य यहाँ से एकदम उठा दिये जायँ और नये स्वभाव के आदमी यहाँ वसाये जाये तब कहीं यहाँ की भलाई की आशा की जा सकती है। उनके हृदय में ऐसे मनुष्य-द्रोह की जड़ जमाने के अपराधी हमी लोग हैं।

हम अगर अपने आचरणों पर निरपेक्ष होकर विचार करें तो हमें अच्छी तरह यह मालूम हो जायगा कि हमारी ऐसी ही अवस्था हो रही है कि विद्यासागर सरीखे सहृदय पुरुप की भी हमारे बारे में ऐसी धारणा हो जाय । विद्यासागर से अगर कोई यह कहता था कि अमुक आदमी आपकी निन्दा करता था तो वे कहते थे-“अच्छा ठहरो, सोच लू, वह आदमी मेरी क्यों निन्दा करता है। मैंने तो कभी उसका कुछ उपकार नहीं किया ” अन्त को उनकी यही धारणा हो गई घो कि उपकृत व्यक्तियों में से अधिकांश लोग कृतन्न होते हैं।

बहुत लोगों के प्राचरण देखकर उनकी यह धारणा हुई थी। अनेक प्रकार के अच्छे कामों में आशानुरूप सुफल होते न देख- कर एक दिन दुःख-पूर्वक उन्होंने यह श्लोक पढ़ा:- कुरङ्गमातङ्गपतङ्गभृङ्गमीना हताः पञ्चभिरेव पश्च । एक:प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च ।। श्लोक पढ़कर कहा-एक-एक इन्द्रिय के अधीन होने से मृग, हाथी, पतङ्ग, भ्रमर और मछली, ये जीव मारे जाते हैं।

तब जो आदमी पांचों इन्द्रियों से पांचों विपयां का भाग करता हुआ उनमें आसक्त रहता है उसका विनाश तो बहुत ही सहज है। कितनी सावधानी से काम करने पर मनुप्य इस सर्वनाश से बच सकता है, इस पर किसी की भी दृष्टि नहीं है। मनुप्य दिन-रात पांचों इन्द्रियों के दास होकर अपने को इतर जीव-जन्तुओं से भी अधम बना रहे हैं। मनुष्य जिनको इतर जीव कहता है वे इतर जीव हैं या वह खुद है ? मनुष्य इन इन्द्रियों के सुख के लिए कौन सा कुकर्म नहीं कर सकता? फिर वह इतर जीव-जन्तुओं से भी अधम क्यों न समझा जाय ?

दुःग्य यही है कि उनके समान महानुभाव पादमी ने लोक-सेवा और पराई भलाई करने के बदले में पग-पग पर ठोकरें खाई। लोगों ने बुरे बर्ताव और ठगाही करके उनके शान्त हृदय में अशान्ति की ऐसी गं सुलगा दी जो जन्म भर सुलगती ही रही। उन्होंने जन्म भर केश सहे, लेकिन दूसरों का दुःख दूर करने से कभी मुख नहीं मोड़ा। किसी का दुःख सुनते ही उनके सरल उदार हृदय में दया का सागर उमड़ पड़ता था। दया करने के समय वे अमीर- गरीब, उच्च-नीच, पुरुप-स्त्री, सती-कुलटा आदि का खयाल न करते थे।

मनुष्यमात्र के लिए उनकी दया का द्वार खुला हुआ था। मनुष्य क्या, पशु-पक्षी भी उनके सरल स्नेह को मानते थे । पक्षियों में कौआ बड़ा धूर्त कहलाता है। यह वात प्रत्यक्ष देखी भी जाती है। किन्तु वे ही कौए उनके स्नेह के अधीन हो गये थे। विद्या- सागर पास खड़े होकर उनको जो कुछ देते थे उसे वे बेखटके उनके हाथ से ले जाते थे। एक बार खुदीराम बसु को विद्यासागर ने कई एक नारंगियों की फांके खाने को दी। खुदीराम बाबू चूस-चूसकर उन्हें फेंकने लगे। विद्यासागर ने कहा-“देखो, इनको न फेंकना ।

इनको खानेवाले यहाँ मौजूद हैं। खुदीराम बाबू ने सन्नाटे में आकर पूछा “इनको कान खायगा?” विद्यासागर ने कहा-“खिड़की के बाहर इस जगह रख दो। देखना, खानेवाले आकर उठा ले जायँगे ।” खुदीराम बाबू ने उन्हें वहीं रख दिया। घड़ी भर वे वहीं रक्खे रहे, पर कोई न आया ।

तव खुदीराम ने कहा-“कोई भी तो नहीं आया। विद्यासागर ने कहा-“तुम्हारे चोगा-चप- कन की तड़क-भड़क से डरकर वे लोग नहीं आते । तुम हट जाओ, देखा मैं उनको अभी बुलाता हूँ।” वस, वे खिड़की के पास गये । उनके खड़े होते ही कौओं ने चिर-परिचित की तरह आकर उनके हाथ से उनको लेकर खा लिया। जिसके प्रेम से पशु-पक्षी वश में हो जाते थे उसके वश में मनुष्य नहीं हुए ! मनुष्यों ने उस प्रेम की मर्यादा नहीं समझी !! वह सरल स्वाभाविक प्रेम मनुष्यों के निष्ठुर आचरण से मलिन हो गया। इसी से विद्यासागर कभी-कभी कहा करते थे “तुम्हारे ऐसे भद्रवेषधारी आर्यसन्तानों की अपेक्षा मेरे असभ्य साँवताल अच्छे आदमी हैं।

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 1

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 2

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 3

Summary

आपको अब तक शायद पता चल गया होनहा की विद्यासागर से जुडी हमारी सभी नैतिक कहानी या या कोई भी किस्सा और बोध कथा बहोत ही बड़ी होती है. इसी लिए हमने सभी नैतिक कहानियों को अलग अलग विभाग में बाटा हुआ है, जिससे की आपको पढ़ने में भी काफी आसानी हो और आपको बोरिंग न लगे. नाकि दूसरा हमारा कोई ध्येय नहीं है.

Leave a Comment