“स्वर्ग” बच्चो के लिए मजेदार हिंदी कहानी – Swarg Hindi Story For Kids

नमस्ते दोस्तों मुझे पता है की आपको कहानिया बहोत ही पसंद है पर शायद आपको किताबे नहीं मिल रही होगी या आपके पास मौजूद नहीं होगी जिसको आप अपढ़ सके, पर चिंता वाली कोई बात नहीं है क्यों की यहाँ आपको किड्स जोन में आपको कही साडी मजेदार कहानिया मिल जाएँगी जो अपने सुनी नहीं होगी।

“स्वर्ग”

पवित्र जलवाली भागीरथी! आज तुम्हारे लिए सुप्रभात है। इसी से तुम प्रात:काल की हवा से बातें करती आनन्द से नाच रही आज तुम्हारे पवित्र जल में पवित्र-शरीर ईश्वरचन्द्र की महा- मूल्य भस्म बहाई जायगी, तुम्हारी हर एक लहर उससे मिलकर नाचेगी। तुम गर्व के साथ उस भस्म को लेकर समुद्र से मिलने जामोगी-उसी से आनन्दमन्न हो रही हो। किन्तु देखो, इस महानूल्य भस्म-राशि का अनादर न होने पावे !

तुम नहीं जानती कि कितने हृदयों का प्राशा-भरोसा, कितने लोगों की सुख-सम्पत्ति, कितने लोगों का आनन्द और आराम हरे लिये जाती हो। तुम्हारे असीम सौभाग्य के समागम को देखकर हम शून्य हृदय लिये तुम्हारी और ताक रहे हैं असमर्थ और असहाय लोगों की मण्डली लँगड़े की तरह तुम्हारी और सतृष्य दृष्टि से देख रही है। देखो, कोई निराश न होने पावे ! इनके आदर की-परम यत्न की- सामग्री यह ईश्वरचन्द्र की भस्म इधर-उधर न बहा देना; परम प्रेम से इस अपने भीतर रखना। जो लोग शव लेकर गये थे, जो लोग साथ गये थे, जो लोग गङ्गातट पर मसान में लेटे हुए विद्यासागर को देखने दौड़े गये थे, आज सब लोग उस महापुरुप को गँवाकर शून्य-हृदय, मलिन-मुख होकर आँखों में आँसू भरे अपने-अपने घर को लौट गये।

विद्या- सागरजी चुपचाप काम करना पसन्द करनेवाले मादमी थे। आश्चर्य है कि मरने पर भी उनकी अन्त्येष्टिक्रिया के समय और कोई शव श्मशान में नहीं पाया। अनेक कष्टों और मानसिक चिन्तामों में उन्हें अपनी ज़िन्तगी बितानी पड़ी थी। यह भी कुछ सुख की बात है कि अन्त को मसान में अकेले थे भस्म हो सके। यहाँ भी उनके जीवन की स्वतन्त्रता इस तरह सुरक्षित हुई। १४ श्रावण को सबेरे चिता जली और उसके वाद चिता बुझने पर अस्थिसञ्चयन हुआ। इसके बाद चारों ओर बङ्गाल के हर जिले, हर गाँव और हर घर में हाहाकार मच गया। धनी-दरिद, उच्च-नीच, बालक-युद्ध, खी-पुरुप सबको विद्यासागर का शोक हुआ।

एक प्रकार से सारे भारत में शोक छा गया। इस तरह देश भर के सब लोग कभी किसी की मृत्यु सं शोकाकुल नहीं हुए। विद्या- सागर के स्कूल के लड़कों ने अपने को पितृहीन समझकर जूते पहनना छोड़ दिया। सब अख़बार शोकचिह्न धारण करके अश्रुपात करते-करते लोगों के यहाँ उपस्थित हुए। चारों ओर भयानक हाहाकार और रोना-धाना मच गया। विद्यासागर के मरने के अवसर पर इस बात का प्रमाण मिल गया कि बङ्गाल के समाज- शरीर में अभी तक जान बाकी है, यङ्गाली लोग किसी हितैपी के शोक में मिलकर हृदय से विलाप कर सकते हैं और बङ्गाली लोग वीर-पूजा करने में किसी से कम नहीं हैं।

भगवान् कृपा करें, इस हितैपी के शोक से-पीरपूजा से जातीय जीवन की शुभ सूचना का सूत्रपात हो। बङ्गाल के जावीय जीवन- चरित के हर एक पृष्ठ में बीरचरित लिखा जाय । विद्यासागर के स्वर्गारोहण के अवसर पर भारत में जा जातीय शोक, क्षोभ और मानसिक सन्ताप का अभिनय देखा गया था वह अगर किसी उपाय से स्थायी बनाया जा सकता तो निस्सन्देह हमारे जातीय जीवन को सङ्गठित और उन्नत बनाने के काम में यथेष्ट सहा- यता करता। बङ्गालियों की शक्ति कं सम्मिलित उद्योग से जातीय अभिनय देख पड़ने में अभी बहुत विलम्ब है।

इसी से विद्यासागर के वियोग के अवसर पर भारत के अनेक स्थानों में अलग-अलग सभा-समितियाँ ‘हुई और स्मारक-चिह्न स्थापित करने की अलग-अलग चेष्टा की गई। कलकत्ते में घर-घर और स्कूलों में विद्यासागर के चित्र की स्थापना हुई है। बंगाल के अनेक स्थानों में अनेक प्रकार से उनका स्मारक बनाने की चेष्टा की गई है। ढाके का अनुष्ठान ही विशेप भाव से उल्लेख के योग्य है। ढाके के धनी-दरिद्र, छोटे-बड़े सव नगरनिवा- सियों के उत्साह और आग्रह से एक बड़ी भारी सभा हुई थी।

बान्धव-सम्पादक श्रीयुत बाबू कालीप्रसन्न घोष ने सभापति की हैसि- यत से विद्यासागर के विविध गुणों का वर्णन किया था। साहित्या- नुरागी श्रीयुत राजा राजेन्द्रनारायण रायवहादुर ने ढाका-कालेज में विद्यासागर-स्कालरशिप नाम से दस रुपये मासिक की एक छात्रवृत्ति जारी करने के लिए ३००० रुपये दिये थे।

बर्दवान में भी सर्व- साधारण के उद्योग से और विद्यासागर के भक्त श्रीयुत गङ्गानारायण मित्र के प्राग्रह से विद्यासागर का एक चित्र स्थापित किया गया था। किन्तु विद्यासागर ऐसे हितैपी के लिए क्या इतना करना ही यथेष्ट है? दुःख यही है कि कलकत्ते की विराट् सभा में कंवल आठ-दस हज़ार रुपये का चन्दा पाया। जिन्होंने गरीबों की संवा और अच्छे कामों में दम-बारह लाख रुपये खर्च कर डाले, जिन्होंने समाज-संस्कार, साहित्यचर्चा और लोकसेवा में अपना जीवन अर्पण कर दिया उनकी पूजा के लिए केवल दस हज़ार रुपये जमा हुए !

फ्रान्स देश के सच्चे हितैषी नेपोलियन ने जब खजनों और अपनी जातिवालों से त्यागे जाने पर सेन्टहेलेना के एकान्त-दास में शरीर त्याग किया था, जब बिना आडम्बर के चुपचाप बोनापार्ट का शरीर कत्र में रक्खा गया था, तब फ्रेञ्च जाति जातीय ऋण के भार को समझ नहीं सकी-फत व्य-बुद्धि के वीत्र तिरस्कार का अनुभव नहीं कर सकी।

किन्तु उनके परलोकवास के दस वर्ष बाद जिस समय उनकी लाश को, समुद्रवेष्ठित सेन्टहेलेना के निर्जन जेलखाने से, देव-देह की तरह पवित्र वस्तु समझकर, फ्रेंच लोग फ्रांस में ले आये थे, उस समय फ्रांस के एक छोर से दूसरे छोर तक सारे देश में एक ही लहर लहरा रही थी, एक ही शब्द गूंज रहा था, एक ही गाव में सव लोग उन्मत्त हो रहे थे, एक शरीर की नरह सब लोग उठकर पिता के शोक से व्याकुल पुत्र की तरह हाहाकार मचाकर विलाप करने लगे थे। महल में, झोपड़ी में, अदालत में, होटल में या गिर्जे में, जो जहाँ था वह वहीं से पागल की तरह दौड़कर उस भीड़ में शामिल हो गया था। उस समय फ्रांस के गाँव और नगर, जङ्गल और बस्ती एक हो गये थे।

उस एकीभूत अपूर्व उन्मादमय भीड़ की उन्मत्त बना देनेवाली शोभा को देखकर सारे यूरोप ने विस्मय और भय के.साथ सिर झुकाया था। पराधीन भारत में भी विद्यासागर के वियोग से जातीय शोकोच्छ्वास की हर एक लहर में वीरपूजा के पुष्प नृत्य कर रहे थे। यह देखकर मेरे मन में भी बड़ी आशा हुई है।

मैं जैसे प्रत्यक्ष देख रहा हूँ कि इतने दिनों के बाद जातीय जीवन का काम शुरू हुआ है। जिनके लिए आज सब रोते हैं, वे महापुरुष थे, इसमें कोई सन्देह नहीं। उन्होंने इतने लोगों के चित्त को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। इससे इसमें सन्देह नहीं कि उनका हृदय प्रशस्त था। सागर के विना और कौन सब नदियों को अपनी पार घसीट सकता है ? किन्तु दुःख यही है कि ये सब नदियाँ सागर की ओर चलकर रास्ते में सामाजिक जटि- लता की मरुभूमि में सूख गई। हम लोग जीते ही मुर्दे के तुल्य हो रहे ! दारुण आलस्य के विप से हमारे सब अङ्ग ऐसे शिथिल हो गये हैं कि हम सहज में खड़े नहीं हो सकते।

खड़े भी होते हैं तो अपने लक्ष्य की ओर आगे नहीं बढ़ सकते। इसी से यह देखकर भी कि कितने ही देशों के लोग उठकर खड़े हो गये हैं, हमको चेत नहीं होता । हम लोग आलस्य की शय्या पर शिथिल भाव से पड़े हुए, विकार-प्रस्त रोगी की तरह, सैकड़ों प्रकार के सुख के सपने देखते हैं और विश्वव्यापिनी उदारता की डींग हाँकते हैं।

विधाता से यही प्रार्थना है कि उनके पाशीर्वाद से इस घोर अमावास्या के घने अन्धकार में विद्यासागर की जीवनी पढ़कर बङ्गाली और सारे भारत के पाठकों के हृदय में जातीय जीवन की लालसा, निष्ठा के साथ कर्त्तव्य-पालन में अध्यवसाय और वीरोचित गुणावली के अनुकरण में प्रवृत्ति हो। ऐसा होने से यह जाति धन्य होगी। जातीय जीवन के इतिहास के पृष्ट में हम नये सिरे से नवीन अध्याय की सूचना करने में समर्थ होंगे।

Summary

मुझे विश्वाश है की इस कहानी में आपको मजा आया होगा, ऐसी ही मजेदार कहानियो और कविताओं के लिए आप हमारे वेबसाइट को रेगुलरली विजिट कर सकते है. और हम आपसे वादा करतव है की आपको रोज अपडेट देते रहगे।

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