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“लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 1

नमस्ते सभी दोस्तों को आपका हमारी वेबसाइट में स्वागत है जिसमे आपको हम अलग अलग विषय पर कुछ जानकरी देने की कोशिश करते है. आज हम यह पोस्ट केवल बच्चो के लिए लेके आये है. जिसमे विद्यासागर से जुडी एक और हिंदी कहानी है और मुझे विश्वाश है की आपको इसमें मजा जरूर आएंगा।

यह हिंदी नैतिक कहानी चार हिसो में है तो आपको सभी भाग यहाँ आसानी से मिल जायँगे और कोई भी भाग जहा ख़तम होता है तो उसके आगे का भाग वही से शरू होंगे तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं है.

“लोक सेवा” लोकप्रिय हिंदी नैतिक कहानी भाग 1

इस नौकर के पुत्र रामटहल के व्याह में जो कुछ खर्च हुआ वह विद्यासागर ने दिया था और अपने ही खर्च से उस वालक को लिखाया-पढ़ाया भी था। उत्तरपाड़ा जाते समय गाड़ी से गिर पड़ने के कारण जो स्वास्थ्य- भंग हुआ वह कभी निर्मूल नहीं हुआ। वे सदा घोड़ा-बहुत वीमार बने ही रहते थे। क्रमश: जवानी ढलने पर पेट की पीड़ा ने ही ज़ोर पकड़ा। डाक्टर की सलाह से वे ज़रा-ज़रा लडेनम् सेवन करने लगे थे।

खाटाड़ में रहते समय एक वार भ्रम से अधिक लडनम् सेवन करने के कारण गोलमाल हो गया था। लेकिन थोड़ी ही देर में अपने भ्रम को समझकर उन्होंने कय करके उसे निकाल कय करने से जान तो बच गई, लेकिन क्लेश बहुत मिला। इस समय इस घटना के सम्बन्ध में देवघर में राजनारायण वाबू को जो पत्र लिखा था उसका कुछ अंश यहाँ पर उद्धत किया जाता है- “बुद्धिदाप से जो शारीरिक उपद्रव उठ खड़ा हुआ था उससे छुटकारा तो मिल गया है, किन्तु अभी तक तबीयत ठीक नहीं है। पेट और सिर में अभी तक विकार मौजूद है।”

खाटाड़ में रहने के समय वे नित्य सवेरे टहलने जाया करते थे। इस समय वे बहुत लोगों की खबर ले आया करते थे। पहले ही लिखा जा चुका है कि विद्यासागर की चाल तेज़ थी। उनके साथ डाला। उस समय जो लोग रहते थे वे उनका साथ न दे सकते थे। विद्या- सागर सदा सीधी राह जाते थे। जहाँ राह घूमकर बनी होती थी वहाँ, ऊँची-नीची कँकरीली ज़मान होने पर भी, सीधे ही जाते थे।

साँवताल लोगों को वे इतना अधिक चाहते थे कि वहाँ उनके आने की खबर पहुँचते ही आनन्द-कोलाहल मच जाता था। हर एक मर्तवा विद्यासागर के पहुंचने पर वे लोग, पहले मिलने के लिए आने कं समय, कुछ न कुछ उपहार अवश्य लेते पाते थे । तरकारी और साग-सयज़ा ही अधिक होती थी। एक बार एक आदमी के और कुछ न था, वह एक मुगी का वचा लेकर पाया। विद्यासागर ने उसे जनेऊ दिखाकर कहा-“मैं इसे नहीं ले सकता।” वह व्यक्ति दुखित होकर रोने लगा। विद्यासागर ने और कोई उपाय न देखकर उस मुगी के बच्चे को हाथ में लंकर फिर वापस कर दिया।

ऐसा उदार व्यवहार करने के कारण ही वे सबके प्यार थे। यह उपवन-शोभित एकान्त-वासभवन अत्यन्त रमणीय है। इसके सँवारने-सिंगारने और सजाने में अभिराम मण्डल के साथ विद्या- ने खुद यहुत परिश्रम किया था। इस चमन में अनेक वृक्ष, लता और कुसुम-कुश विद्यासागर के दाय के लगाये जब यह सब वृत्तान्त जानने के लिए साटाड़ गया था तब उस चमन के प्रीतिपूर्ण सन्नाटे ने मेरे हृदय में एक प्रकार के विपादपूर्ण गाम्भीर्य को पैदा कर दिया था।

मुझे जान पड़ा कि विद्या- सागरजी संसार के सैकड़ों शाकों से छुटकारा पाकर सूक्ष्म शरीर से परम आनन्द के साथ इस निर्जन वृक्षवाटिका में ध्यान-मग्न बैठे हुए स्वगीय सुख का अनुभव कर रहे हैं। जान पड़ा, जैसे उस याग का हर एक वृक्ष और लता तक उनके साकार-सहवास के सुख से वञ्चित हो जाने के कारण दुःख के मारे सिर लटकाये खड़ी हुई है। होमिओपेथी। कलकत्ते के डाक्टर राजेन्द्रनाथ दत्त ने बंगालियों में सबसे पहले होमियोपेथी-चिकित्सा चलाई थी।

विद्यासागर को सबसे पहले इन्हीं से होमियोपेथी की उपयोगिता और उपकारिता मालूम हुई। जब विद्यासागर ने समझा कि बूंद-बूंद दवा पीने से भी फायदा होता है तब वे इस चिकित्सा के पक्षपाती हो गये। औपध की उत्तमता, कीमत की कमी और सेवन करने में कुछ खटखट न देखकर विद्यासागर इस चिकित्सा के प्रचुर प्रचार में सहायता करने लगे। डाक्टर श्रीयुत महेन्द्रलाल सरकार मुझसे कहते थे कि एक दिन बहुत वाद-विवाद और तर्क-वितर्क के बाद विद्यासागर ने उनसे यह स्वीकार करा लिया कि होमिओपेघी-चिकित्सा से कुछ लाभ होता है या नहीं, इसकी जाँच करूँगा।’

अनुसन्धान-प्रिय डाकृर सरकार ने विद्यासागर से जांच करने का वादा कर लिया और शीघ्र ही इस चिकित्सा की विज्ञान-सङ्गत्त मूलभित्ति की खोज करने लगे। थोड़े ही दिनों में उनका यह विश्वास हो गया कि इस पद्धति से चिकित्सा की जाय तो मनुष्य घाड़े खर्च में अनायास अच्छा हो सकता है। यह विश्वास होते ही वे इस मार्ग अग्रसर हुए। के लिए डाक्टर बाबू विद्यासागर के विशेप कृतज्ञ हुए।

डाक्टर विहारीलाल भादुड़ी, डाक्टर अन्नदाचरण खास्तगीर आदि अनेक डाक्टर विद्यासागर के अनुरोध और सलाह से धीरे-धीरे होमिओ- पेथी-चिकित्सा करने लगे। होमिओपेथी के प्रचार के वे इतने पक्ष- पाती थे कि उन्होंने गाँवों में अनेक जगह होमिओपेथी-चिकित्सा- लय स्थापन करने में भी सहायता की थी।

भास्ताड़ा-निवासी ज़मी- दार पावू यज्ञश्वर सिंह लिखते हैं “खैराती दवा बॉटने के लिए होमियोपेथी अस्पताल खोलने की इच्छा प्रकट करने पर उन्होंने यहाँ आकर उसकी व्यवस्था कर दी थी। होमिओपेथिक चिकित्सा का सुप्रचार होने पर भी अभी तक लोगों का इस पर पूर्ण विश्वास नहीं जमा। किन्तु विद्यासागर को इस चिकित्सा पर सोलहों पाने विश्वास था। उन्होंने होमिओपेथी-चिकित्सा के सम्बन्ध में बहुत से ग्रन्थ पढ़े थे। वे चाहे जहां रहते थे, उनके पास होमिओपेथिक दवाओं का याक्स और पुस्तकें रहती थीं।

चिकित्सा करते-करते उस काम में उन्होंने अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली थी। पहले कहा जा चुका है कि पढ़ने की अवस्था से ही वीमार सहपाठियां और अन्यान्य लोगों की रोगशय्या के पास बैठकर उन्होंने अनेक रातें और दिन विताये होंगे। होमियोपेथी के प्रचार के पहले बीमार गरीबों की चिकित्सा के लिए चे टाकुर दुर्गाचरण वन्द्योपाध्याय, डाकृर सूर्य- कुमार सर्वाधिकारी, विहारीलाल भादुड़ी, नीलमाधव मुखोपाध्याय आदि बहुत से डाकृरों की सहायता लिया करते थे।

डाकृर सर्वाधिकारीजी कहते थे कि विद्यासागर के अनुरोध से मैं अनेकों वार, दिन और रात को भी, दीन-दुखी लोगों की दवा करने गया “हूँ। इसका सिलसिलेवार विवरण लिखने से एक बड़ी पाधी धन सकती है। होमिओपेथी-चिकित्सा पर विश्वास हो जाने पर एक और उनके प्राग्रह और उद्योग से अनेक योग्य डाकृरों ने इसी प्रणाली के अनु- सार चिकित्सा करना शुरू किया और दूसरी ओर बहुत दिनों तक अनुसन्धान और अनुशीलन करके एक प्राण डाक्टर की ऐसी जानकारी हासिल कर ली। धीरे-धीरे ऐसा हो गया कि अन्य चिकित्सा की सहायता के बिना ही वे कठिन रोगियों की चिकित्सा में सफलता प्राप्त करने लगे। होमिओपेथी ढङ्ग से चिकित्सा शुरू करने पर उनको यह सुभीता हो गया कि वे खुद खुद उन्होंने जाकर रोगी को देख पाते घे, अन्य डाकृर को कष्ट देने की ज़रूरत न पड़ती थी ।

वक्त बेवक्त उनको अनंको बीमारों के घरवाल बुला ले जाते थे। ऐसी अनेक घटनाएँ मैंने अपनी आँखों देखी हैं। वे किसी को चौमार देखकर ऐसा कष्ट पाते थे कि उसे दूर करने के लिए कोई कसर उठा न रखते थे। हृदय के दर्द, दमा और खाँसी की दवा चाँटने के लिए बनी रक्खी रहती थी ।

जो कोई जाता था उसे मुत दी जाती थी। धनोपार्जन के लिए नहीं, केवल परोपकार के लिए उन्होंने चिकित्साशास्त्र का अनुशीलन किया और सदा लोकोपकार के लिए निष्ठा के साथ वे इस कार्य को करते रहे। खाटाड़ से श्रीयुत राजनारायण वसु को विद्यासागर ने जो पत्र लिखा था उसमें इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। उस पत्र का कुछ अंश यह है- “मैंने इरादा किया था कि कल या परसों आपको देखने जा गा । किन्तु ऐसे दो रोगियों की चिकित्सा कर रहा हूँ कि उनको छोड़- कर जाना किसी तरह उचित नहीं जान पड़ता।

अतएव दो-चार दिन के लिए देवघर की यात्रा मैंने रोक दी है।” साँवताल लोगों की वे जिस तरह जी लगाकर मुफ़ चिकित्सा करते थे उस तरह अनेक ढाकृर लोग फीस लेकर भी रोगी की चिकित्सा नहीं करते. विद्या- सागर ने मधुसूदन ऐसे प्रतिष्ठित पुरुप का विपत्ति से उद्धार, भोजन न मिलने के कारण मृत्यु के मुख में पड़े हुए लोगों की प्राण-रक्षा, मले- रियासे पीड़ित मुसलमानों के घरों में जाकर दवा और पथ्य का देना और साँवतालों के स्नेह आदि सव कार्य अपनी साघुप्रवृत्ति की उत्तेजना से किये थे।

विद्यासागर के स्वर्ग-वास से एक और अनेक विपन्न प्रतिष्ठित पुरुप जैसे वन्धुहीन हो गये वैसे ही दूसरी ओर अनेक गरीव दुखी लोग निराश्रय होकर चारों ओर अन्धकार देखने लगे। हिन्दू पारिवारिक वृत्ति-भाण्डार। जो लोग पराये दुःख का अनुभव करते हैं वे ही संसार में दुखी हैं।

जो लोग बड़े कष्ट से दस-पाँच रुपये पैदा करके कष्ट से जीवन धारण करते हैं, सवेरे-शाम अपने भाग्य की निन्दा करते हुए, तङ्गी के कारण आँसू वहाते हुए, दिन बिताते हैं वे ही दुखी हैं। बङ्गाल के मध्यवर्ती गरीब भद्र पुरुष ही इस श्रेणी के दुखी पुरुष हैं। प्रायः एक साधारण कमाई करने- वाले आदमी के ऊपर परिवार के अनेक आदमियों के भरण-पोपण का भार रहता है। दैव-योग से अगर उस आदमी का देहान्त हो जाता है तो बहुत से आदमी जीविका-हीन हो जाते हैं।

विद्या- सागरजी ने अन्य किसी-किसी सदाशय पुरुप की सहायता से इस तरह के लोगों की सहायता के लिए एक वृत्ति-भाण्डार स्थापित किया इस अनुष्ठान के पृष्ठ-पोषक सर महाराज यतीन्द्रमोहन, सर रमेशचन्द्र और उद्योगी केशवचन्द्र सेन के बड़े भाई वाबू नवीनचन्द्र सेन, राजेन्द्रनाथ मित्र रायवहादुर आदि अनेक सज्जन विद्यासागर के सहायक वन गये थे। आज इस वृत्ति-भाण्डार की सहायता से असंख्य परिवार असमय में, कोई उपाय न रहने पर, मासिक वृत्ति पाते और अपना गुज़र करते हैं।

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 2

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 3

Also Read- “लोक सेवा” हिंदी नैतिक कहानी – Public Service Hindi Moral Story Part 4

Summary

आपको अब तक शायद पता चल गया होनहा की विद्यासागर से जुडी हमारी सभी नैतिक कहानी या या कोई भी किस्सा और बोध कथा बहोत ही बड़ी होती है. इसी लिए हमने सभी नैतिक कहानियों को अलग अलग विभाग में बाटा हुआ है, जिससे की आपको पढ़ने में भी काफी आसानी हो और आपको बोरिंग न लगे. नाकि दूसरा हमारा कोई ध्येय नहीं है.

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